रविवार, 23 मार्च 2008

श्यामा भाग 1 (पान-२) पूर्ण

शामा

श्यामा
भाग 1 (पान-२)

'हा निरोप तुम्हाला सुषमा ने सांगितला?' नितीन ने थक्क होऊन विचारले।

'छे छे मलाच वाटल!' शामा क्षणभर घुटमळली. बोलाव का बोलाव अशा संकोचात? पण दुसप्याच क्षणी हसू म्हणाली- 'पण तों फोटो खरच छान येईल हं, बघाच तुम्ही'.

नंतर नितीन ने सुषमा चा त्या खास अँगल ने फोटा काढला होता- ते फंक्शन संपून गेले. रोल धुऊन आल्यावर नितीनने सगळे फोटो पाहिले अन्‌ सुषमाचा तो फोटो आल्यावर तो खुळावून बघतच राहिला. फोटो अप्रतीम आला होता. लांवसडक डूल तिच्या लांबोळया चेह-यावर खुलून दिसत होते. त्यांची आभा चेह-यावर पडलेली स्पष्ट जाणवत होती. तिचे धारदार नाक आणी पापण्यांचे लांब केसही फोटोत ऍक्सेंच्युएट झोले होते. पापण्या अर्धोन्मिलीत होत्या. जणू वळवाच्या पावसात भिजायला जावे. आणी पावसाचे पहिजे चार थेंब अंगावर पडल्यानंतर पुढल्या सरींची उत्कठेने वाट बघावी तसा प्रतीक्षा उत्कंढेचा भाव तिच्या अर्धवट मिटल्या डोळपातून प्रकट होत होता. नितीन खूष झाला. या फोटोचे काय करू अन कांय नको असे त्याला होऊन गेले. त्याचे वेगवेगळे एनलार्जमेंट साइझ त्याने करायला टाकले. इतक्यांत सुषमाला फोटो बद्दल कांही सांगायचे नाही असे त्याने ठरवले.

पण दुस-या दिवशी लांबून शामा लायब्ररी कडे जातांना दिसली तेंव्हा त्याला राहवले नाही. तो धावतच लायब्ररीत गेला. शामा रॅकजवळ पुस्तक शोधत होती तिच्या जवळ जाऊन नितीन ने तिला फोटो दाखवला.

'ओह! काय सुंदर निसतेय नाही सुषमा? सिनेमात काम करायला गेली तर हेमा मालिनी नंतर हीच अस लोक म्हणतील'

'अच्छा, तिला कुणीतरी अस सांगायला पाहिजे!' नितीन थोडया थट्टेने म्हणाला. सुषमा लोकांना त्यांचे सल्ले झिडकारण्यांत पण पटाइत होती. अर्थात हे शामाला माहित नसणार ती म्हणाली- 'यू आर्‌ राइट. मी आजच तिला सांगते.

तेवढयांत 'शामाताई, हे पहा तुमच्यासाठी एक चांगल पुस्तक आणलय' म्हणत फॅब्रिकेशन सेक्शन चा फोरमन आला आणि शामा. 'एक्सक्यूज हं मी जरा यांच्याबरोबर जातेय' अस सांगून तिकडे वळली.

नितीन परत आला. मुबईच्या एका मासिकाने फोटो स्पर्धा जाहीर केली होती त्यासाठी त्याने सुषमाचा हा फोटो इतरही चार पाच फोटो पाठवून दिले. का कुणास ठाऊक पण आपल्याला स्पर्धेत नक्की बक्षीस मिळणार असे त्याला वाटले. सहज त्याच्या मनात विचार आला- ही शामा थोडी वेगळी वाटते. परवा तिने बिनदिक्कत आपल्या खांद्यावर हात ठेवला म्हणून थोडी आगाऊ वाटली पण तिची फोटोग्राफीची जाण चांगली आहे. आणी फोटो पाहिल्यावर कांय बोलली- तर पाहून आपण म्हटले होते- वा नितीन, यार कांय साधलीय्‌ तुझी फोटोग्राफी! हिने पण म्हटले असते- 'पहा, मी सांगितल होत ना छान फोटो येईल म्हणून'- तर आपल्याला राग नसना आला. खर तर तिच्या सल्ल्याच क्रेडिट तिला द्याव यासाठीच आपण लायब्ररीत गेलो होतो. पण हिला जाणवल होत ते फक्त सुषमाच सौंदर्य- स्वतःच्या सल्ल्याच मोल पण वाटल नव्हत.

तेवढयात शुक्‌ शुक्‌ नितीन, अशी हाक कानावर आली. तो वळला- मागे सुषमा आणि जयेंद्र उभे होते- काय रे तू सुषमाचा अगदी टॉप फोटो काढलायस म्हणे. मग दाखव की लेका जयेंद्र म्हणाला 'हो ना समारंभात काढलेले फोटो दाखवायचे असतात म्हटल' इति सुषमा! 'पण आता माझ्याजवळ त्याची कॉपी नाही उद्या दाखवतो' - मग शामा कशी म्हणाली तिने पाहिला म्हणून- खर तर तिनेच ठेऊन घेतला असता तर मला लगेच बघता आला असता' उद्या नक्की दाखवले असे म्हणून नितीनने वेळ मारून नेली. मग चार दिवस तो कॉलेजात फिरकलाच नाही.

आणि आठ दिवसांपूर्वी त्या फोटोग्राफी स्पर्धेचा निकाल लागला तोच मुळी नितीन सुषमाला आश्चर्याचे आनंदाचे धक्के देत. स्पर्धेत सुषमाच्या फोटोला पहिले बक्षिस पाचशे रूपये मिळाले होते. तर सुषमाला दोन ऑफर्स आल्या होत्या. ज्या कीर्तीकर ज्वेलर्सने इयरिंग्ज बनवल्या होत्या त्यांनी तिला त्यांच्या दागिन्यांच्या मॉडेलिंग साठी पाच वर्षे बुक करून घेतले होते तर सुप्रसिद्ध दिग्दर्शक कुणाल यांनी त्यांच्या नव्या चित्रपटात सहनायिकेचा रोल दिला होता. परीक्षा दोन महिन्यांवर आली होती. शेवटचा पेपर संपवून लगेच सुषमाने मुंबईला कुणालांकडे जायचे असे ढरले होते. त्यांच्या कॅमेरामन ने देखील नितीनची चौकशी करून ठेवली होती. या सर्व गडबडीत नितीन शामाबद्दल विसरूनच गेला होता. तो आज त्याला आठवण झाली. शामाला शोधून तिचे आभार मानायचे अस त्याने ठरवल. पण मुलामुलींच्या घोळक्यांत ती कुठे दिसली नाही. मुद्दाम कुणाकडे चौकशी करावी अस कांहीही घडलेल नव्हत.................
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शुक्रवार, 14 मार्च 2008

एक शहर मर गया ।

एक शहर मर गया ।
-- लीना मेहेंदले
सोलहवीं सदीने अंगडाई ली। उसकी नजर पडी सह्याद्रीके जंगलकी एक बस्तीपर। सदीने कहा-- आनेवाले दिनोंमें यहाँ कुछ नया होगा।
बस्तीसे पूरब एक घना जंगल था। पश्च्िामकी तरफ थे खेत। वहाँ अधिकतर बाजरा, थोडी अरहर, कभी चना, कभी तिल उगाया जाता था। मेडोंपर किसीने आम, किसीने इमली, किसीने सागवान और किसीने बबूल-नीम लगा रखे थे। लेकिन उन पर पूरी बस्तीका सांझा माना जाता था। जिसे घरमें चटनीके लिये इमली चाहिये हो, रमई काकाके मेंडसे उठा लाये, जिसे नीमका दातुन करना हो, आगे पसीरा चाचीके खेतमें चला जाये। सब्जीयाँ और फूल खेतमें नही उगाये जाते थे। बस्तीके हर घरके अगल बगल ये लगे हुए थे और उनपर भी गांवका सांझा माना जाता था।
बस्तीकी असल संपत्त्िा तो जंगल थी। खास कर बढई और चर्मकारोंके लिये। खेतके लिये हल बनना है या घरमें बिछानेके लिये चारपाई, तो जंगलसे लकडी लाकर ये काम संपन्न होते। मरे जानवरकी खालको हर्रेके पानीसे धोधोकर तैयार किया जाता। वे हर्रे भी जंगलमें ही थे। बस्तीके चर्मकार भी चर्मकार नही, कलाकार थे। उनके बनाये चप्पलोंकी खरीदारीके लिये दूर-दूरसे व्यापारी आते थे। हरिया चर्मकारको चार कोस दूर देशके राजाने अपने दरबारमें बुलाकर खास सम्मान किया था। तब हरियाकी उमर रही होगी पच्चीस-सताईस वर्ष। राजाने पूछा था- चप्पलोंपर इतनी मेहनत, इतनी कशीदाकारी कैसे करते हो? तुम्हारी चप्पलें इतनी मुलायम हैं मानों कोई हल्के गरम कपडेसे पैरोंको धीरे धीरे दबा रहा हो। यह कला कहाँ सीखी? हरियाने एक पल आंखें मूंदी तो जंगल नाच उठा था आंखोंके सामने। हरियाने उत्तर दिया- महाराज, हमारे जंगलमें हर्रेके पेड हैं। उनके पास हम रोज जाते हैं। वही हमें सिखाते हैं कि चमडेको कैसे नर्म मुलायम बनाया जाय। राजाने कहा- तो ध्यान रहे कि तुम्हारा जंगल सदा हरियाला रहे।
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इस बातको हुए बीस पावस ऋतु बीत गए हैं। आज हरिया बस्तीके सबसे पुराने आमके नीचे बैठा है। उसने बस्तीको यहाँ इकट्ठा होनेके लिये कहा है। अभी लोगोंके आनेमें देर है। हरिया मन ही मन अपने शब्दोंको उलट-पुलट कर देख रहा है। वह क्या कहना चाहता है? क्या वह खुद ठीकसे समझ रहा है? क्या गांववालोंको समझा पायगा? कि अब बस्तीके लोग बढ रहे हैं। खेतकी फसल कम पड रही है। जंगलसे जो कंद मूल, करौंदे, जाम, महुआ, गूलर आदि आते थे वे भी कम हो रहे थे। ऐसा नहीं कि गांववाले इसे न समझते हों। इसी आमके नीचे बैठ कर यही चर्चा कई बार हो चुकी है। हरिया आज नया क्या कहने वाला है? उसे स्वयं ही पता नही।

गाँववाले जमा हुए तो हरियाने उठकर पहले अपने बूढे बापके और फिर रामधारी बाबाके चरण छुए। अपनी जगह वापस आते आते वे सारे शब्द भूल गए जो उसने इतनी देरसे मनमें रखे थे भूमिकाके लिये। अब बिना किसी भूमिकाके उसने घोषणा की- मैं बस्ती छोडकर जा रहा हूँ। इस गांवकी जमीन, खेत और जंगल अब कम हो रहे हैं। लोग बढ रहे हैं। हमें नई जमीन देखनी होगी, नया गांव बसाना होगा। कौन कौन चलेगा मेरे साथ?
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जानेकी तैयारी पूरी हो चुकी थी। हरियाको ही मुखिया मान लिया गया था। कुल चालीस परिवार जा रहे थे जिसमें तेईस तो चर्मकारोंके ही थे। वे अपने साथ पशु भी ले जा रहे थे। इसका मतलब था कि आने वाले दिनोंमें उन्हें पशुपालन और चरवाहेके काम भी सीखने थे। सात किसान परिवार थे। पांच बढई। बाकी और और लोग।
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रातको मधुकरने हरियाको बुलाया -- मेरी अम्मांने तुमसे मिलनेको कहा है हरिया।
मधुकर गांवका वैद था। उसके पिता कई वर्ष पहले मर चुके थे। अम्माँने ही उसे पाला पोसा था। वैदकीकी सारी बातें उसे सिखाई थी। गांवमें किसीको बुखार हो जाय, सांप-बिच्छू काट ले, गिर कर चोट लगे, सब मधुकरकी अम्माँ से, और अब मधुकरसे पूछते थे। दूर दूरकी बस्तीसे भी लोग पूछने आते थे। कभी अपने बिमार पशुको ले आते थे।
ऐसी मधुकरकी अम्माँने बुलाया है तो जरूर कोई खास बात होगी। हरिया तुरंत उठकर मधुकरके साथ चल पडा।
एक दियेकी लौमें मधुकरकी अम्माँ अपने चारों ओर दवाईकी पोटलियाँ बिछा कर बैठी थी। हरियाके आते ही कहा- हरिया तू बस्तीसे बाहर जाकर दूसरा गांव बसानेकी बात कह रहा है?
हाँ मधुकरकी अम्मां। याद है एक बार अपने गांवमें नट आया था। बता रहा था कि कैसे पछरिया गांवसे कुछ लोग चले गए थे अलग बस्ती बसाने। हमारी बस्ती भी तो ऐसे ही किसीने आकर बसाई होगी। मैं बस्तीसे बाहर जानेकी बात कह रहा हूँ क्यों कि अब अपना जंगल और खेत पूरे नही पड रहे हैं।
तो ठीक है। तुम्हारे लिये ये जडी-बूटियाँ अलग कर रही हूँ। दूसरा गांव बसाएगा तो वहाँके जंगलमें इन्हें ढूँढकर पहचान करनी पडेगी। वरना गाहे-बगाहे बिमार पडो, पशु मरने लगे, तो तुम सब क्या करोगे?
हरियाकी आंखोंके सामने अपने अगले बीस वर्ष कौंध गए। एक दूसरा ही विचार उपजने लगा।
अम्मां, रूक जाओ। ये सारी जडी और लत्तर यहाँ मधुकरके लिये रख दो। तुम भी हमारी टोलीके साथ चलो।

ये तू क्या कह रहा है हरिया? मधुकर अकेला पड जायगा।
नही अम्मां। उसने अपने लिये किसीको ढूँढ लिया है। क्यों रे मधुकर, तेरा कोयलीके साथ नही चल रहा है? फिर तुम दूसरी झोंपडीमें चले जाओगे। अम्मां अकेली हो जाएगी। तो क्यों न हमारे साथ चले? गांवकी वैदकी तू करेगा। हमारी नई बस्तीकी वैदकी अम्मां करेगी।
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जानेकी तैयारीके लिये पंद्रह दिन तय हुए। दूसरे दिन मधुकरकी अम्मां मधुकरको जंगलमें ले गई। वहाँ
पानीके तीन-चार सोते थे। उन्हींमें से एकको पार करके करौंदेके झुण्ड तक आये। उससे बहुत आगे बूढा बरगद था। बीचमें एक अनचिन्हे पौधेका झुरमुट बना हुआ था। उसमें लुभावने पीले फूल लगे थे।

अम्मां झुरमुटके बीचोबीच बैठ गई और बूढे बरगदको हाथ जोडे। फिर मधुकरसे कहने लगी।
सुन, ये पुरानी कहानी है। तब मेरे बाबा जीवित थे और वैदकी करते थे। छोटी वयससे ही मैं उनके साथ जंगलमें आकर जडी बूटी पहचानने लगी थी।
एक बार गांवमें विचित्र महामारी आई। लोगोंके बदन तपते थे, उलटी होती थी, नाक बहने लगती थी। फिर लोग मर जाते। एक एक कर तेईस लोग इसी बिमारीसे मर गए। गाँववाले मेरे बाबाको दुहाई देने लगे।
तब बाबा इस बरगदके पास आए। हाथ जोड कर प्रार्थना की। कहा -- तुम न जाने कितनी पीढियोंको देख चुके हो। उनके रोग और शोक संतापको भी देखा है। तो फिर तुम्हारी वृक्ष जातिके पास जो ज्ञानका भंडार है उसे खोलो और मुझे बताओ कि इस बिमारीपर मैं कौनसा उपाय करूँ। यह महामारी रही तो एक एक करके हमारे सारे लोग मर जायेंगे।
मैं तुम्हारे पास प्रति दिन आऊँगा। तुमसे उपाय पूछने। यह जंगल तुम्हारा है और यह बस्ती भी तुम्हारी है। इसे बचानेका उपाय तुम्हें ढूँढना होगा।
तो तुम्हारे बाबा बरगदके साथ बात कर सकते थे? फिर क्या हुआ? मधुकरने अचरज से पूछा।
बाबा कहते हैं कि उस दिन बरगदने सारे पेडोंसे बात की। यह बिमारी क्या है? हमारे बस्तीके मनुष्योंको क्यों लग रही है? इसका उपाय करनेके लिये किस पेडके पास क्या क्या प्रभावी तंतु हैं?
उस दिन जंगलके सभी पेड पौधोंने अपने अपने ज्ञान भंडारमें झांक कर देखा। किसीके पास पचास वर्षोंका भंडार था तो किसीके पास सौ वर्षोंका। बरगद खुद भी केवल अस्सी नब्बे वर्षका था। लेकिन तब यहाँ एक ढाई सौ वर्ष पुराना पेड था। उसने अपनी परतें पलटकर देखीं। वहाँ कहींपर इस बिमारीकी जानकारी थी। फिर उसी पेडने सुझाया कि किस किस पेड पौधेको अपना कौन कौनसा तंतु देना होगा ताकि एक नई जातिकी पौध उग सके। वही पौध इस बिमारीका उपाय है।
उसके बाद पंद्रह दिनोंमें ही यह झुरमुट उग आया जहाँ हम बैठे हैं। इसीकी टहनीके गूदेसे बाबाने उस भयंकर महामारीका सामना किया था।
मधुकर अवाक् सुन रहा था। अम्माँ बताती रहीं।
तबसे बाबाकी वैदकीकी कथा दूर दूरतक फैल गई। आज भी जो लोग मेरे पास आते हैं वे मुझे बाबा मानकर ही आते हैं।
लेकिन वह महामारी? मैंने तो कभी गाँवमें कोई महामारी नही देखी है। मधुकरने पूछा-
हाँ, वह महामारी फिर नही लौटी। बाबाके या मेरे जीवन कालमें नही लौटी। लेकिन कौन जाने तुम्हारे जीवन कालमें लौट आये। और अब यह हरिया मुझे दूसरी बस्तीमें ले जा रहा है। तो कौन जाने, वहाँ महामारी लौट आये।
लेकिन वहाँके जंगलके पास ये पौधें नही हुए तो? इसीलिये तो तुझे यहाँ लाई हूँ कि थोडेसे बीज यहाँसे इकट्ठे करेंगे। उन्हें मैं नए जंगलमें डाल दूँगी।
अम्माँ, केवल बीज नही डालना। किसीको यह समझा भी देना।
हाँ, रे। अब मुझे उस बस्तीके किसी छोटे मधुकरको तैयार करना पडेगा।
और अम्माँ, वह पुराना पेड कौन सा है जिसने बरगदके कहने पर अपनी परतोंको खोलकर बिमारीकी जानकारी दी थी?
वह पेड भी बाबाने मुझे दिखाया था। लेकिन लगता है कि उसका कोई नाता बाबासे जुड गया होगा। बाबाकी मृत्युके बाद मैंने देखा कि धीरे धीरे वह पेड भी सूख गया। फिर एक बार जंगलमें आग लगी थी तो उसमें झुलसकर मर गया था।
तो अब अपने जंगलमें सबसे पुराना पेड कौन सा है?
एक तो यह बरगद ही है। लेकिन बाबा कहते थे कि चौथे सोतेके पारका शीशम शायद सबसे पुराना है। उधर कुछ ओक हैं वे भी पुराने हैं।
बेटे, पुराने पेडोंका विशेष ध्यान रखना। उन्होंने हमारी कई पीढीयाँ देखी होती हैं- हमारे दुख दर्द, जरा, व्याधिकी बातें पेडोंके पास लिखी होती हैं। हम उनकी भाषा नही पढ पाते, वरना कितना कुछ जान सकते थे।
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पचीस वर्ष बीत गए। हरियाको इसलिये यह गिनती याद है क्योंकि जब वे गांवसे चले थे तो लखमनाकी गोदमें दो माहका शिशु था। आज वही चंदर पचीस वर्षका हो गया है। लखमना और दुलारी तो उसके माँ बाप ठहरे। लेकिन मधुकरकी अम्मांने भी उसे पाला पोसा है। जैसे किसन कन्हैय्याको जशोदाने पोसा था। उसे जंगल ले जा जाकर वैदकी सिखाई है।

महामारी वाले पौधोंका झुरमुट भी मधुकरकी माँ और चंदरने जंगलमें खास तौरसे जतन किया है।
चंदरपुर गांव बसानेके पहले हरिया, लखमना और मधुकारकी अम्माँने आसपास कई कोसोंका इलाका देख डाला था। फिर दो नदियोंके संगमके पास यह जगह चुनी थी। चालीस परिवारोंको बसाने लायक खुली जमीन तैयार करनी थी। लेकिन उसके लिये कोई पेड न कटे ये भी देखना था। इस इलाकेके राजासे मिलकर गाँव बसाने और खेती करनेकी आज्ञा लेने हरिया और लखमना गए। खेतीकी वसूलीसे राजाको कितना कर दिया जायगा और जंगलका कितना हिस्सा गाँवका माना जायगा, यह सब तय करनेके बाद ही आज्ञा मिल पाई। लेकिन इतनेभरसे राजा संतुष्ट नही हुआ। उसने पूछा - तुम्हारे जो चालीस परिवार हैं, उनमें क्या हुनर है? हमारे राज्यके लिए तुम लोग किस काम आओगे?
हरियाका कौशल फिर एक बार अपनी धूम मचा गया। उसने बडे जतनसे बनाई चप्पलोंकी जोडी रानीके सामने रख दी। लखमना धानसे महीन चिऊडा बनाता था। उसने भी अपनी पोटली राजाके सामने रखी।
हूँ, तेरे किसान और चर्मकार बडे हुनरमंद लगते हैं। और कौनसे हुनर हैं?
सुगीराम बढई है - बाँसका काम करता है। और एक बूढी अम्माँ है जो वैदकी जानती है - पेडोंसे बात भी करती है। महामारीका इलाज ढूँढ लेती है।
तमाम चालीसों परिवारोंका पूरा हालचाल जान लेनेके बाद ही मंत्रीने उन्हें गांव बसानेका आज्ञापत्र दिया था। दो दिन लग गए थे, राजनगरमें। अब तो गांव पूरी तरह बस गया है। परिवार भी बढकर तीन सौ हो गए। दूसरे बस्तियोंके कई परिवार भी इधर आ गए। चंदरपुर धीरे धीरे एक व्यापारी केंद्र बन गया।
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चंदर बारह सालका था तबकी बात है। हरिया और मधुकारकी अम्माँको राजनगरसे बुलावा आया था। चंदर भी साथ गया था। उधर एक गांव पडता था शिवापुर - वहाँ महामारी आ गई थी। दाने निकलते, बदन तप जाता, फिर दाने फूटते थे, शरीर जलने लगता था और देखते देखते रोगी मर जाता। सारा खेल चार से आठ दिनोंमें खत्म हो जाता।
चंदर और मधुकरकी अम्माँने आस पासके जंगल छान डाले थे। अम्माँ हर पुराने पेडके पास जाती - उसे बताती - रोगियोंका पूरा ब्यौरा। हर शाम निराशामें सिर हिलाकर कहती,  देर लगेगी - किसी पेडको पता ही नही इस महामारीके विषय में।
लेकिन दो महीनेमें ही उन्होंने देखा - जंगलमें नीमके कई नए पौधे उग आये थे। इन जंगलोंमें ये नये ही थे। क्या ये महामारीसे छुटकारा दिलाएंगे? मधुकरकी अम्माँने सारे रोगियोंके लिए नियम बना दिया कि वे इन्ही पौधोंके आसपास रहेंगे। धीरे धीरे महामारीका प्रकोप कम हुआ। तबसे शिवापुर और चंदरपुर इलाकेमें नीमके पेड उगाने ओर बढानेका रिवाज चल पडा।
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सत्रहवीं सदीने अंगडाई ली। चंदर अब पचपन सालका था । रोजकी तरह वह जंगलमें आया था - वहाँ सबसे पुराना एक अगस्तिका पेड था। उसीके नीचे बैठकर चंदर उसे गांवका हालचाल सुनाता था।
पिछले दिनोंसे गांवमें एक अजीब रोग छा गया था। रोगीके मुँह से लार टपकती थी - आंखें मटमैली हो जातीं - उनसे कीच निकलती। फिर हाथ-पैर कांपने लगते, फिर गर्दन हिलने लगती। आठ दस दिनोंमें रोगी कंपकंपीसे जर्जर और ठंडा पडने लगता। फिर हिचकियोंके बीच उसकी मृत्यु हो जाती। चंदरने मधुकरकी अम्माँको मन ही मन हाथ जोडे और नये रोगियोंका पूरा ब्यौरा अगस्तिके पेडको बताने लगा।
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पांच दिन बाद पूर्णमासी थी। चाँदकी रोशनीसे अमृत बरस रहा था। उससे पुष्ट होकर हर पेड और पौधेका हर कण सचेतन हो रहा था। हवामें पेड झूम रहे थे, डोल रहे थे। उनके पत्तोंके छोरसे लहरियाँ फूट फूट कर वातावरणमें बिखर रही थीं। धीरे धीरे ये लहरियाँ एक दूसरेमें घुल मिल गईं और तमाम पेडोंके बीच एक झनकार बनकर छा गईं। अब हर पेड एक दूसरेसे बोल सकता था - एक दूसरेको समझ सकता था।
सबकी चेतनामें एक ही प्रश्न था जो वे अगस्तिके पेडसे पूछना चाहते थे, क्योंकि वह आयुमें सबसे बडा था। यह कौनसी महामारी है जो चंदरके लोमों और केशोंसे हमें पता चली? हमें कौनसे नये पौधोंका सृजन करना पडेगा? उसके लिये आवश्यक तन्तु किस किस पेडके पास हैं?
अगस्ती के साथ साथ जंगल में एक सोमका पेड भी लम्बी आयुका था। दोनोंने अपनी परतें खोलीं। इसी समय कोसों दूर स्थित पुराने पेडोंसे चलकर आ रही लहरियाँ भी उन्हें जानकारी दे रही थीं। तमाम जानकारीके एक एक चेतन बिंदुको हर पेड ने, हर पौधेने छान डाला। उस जानकारीसे तय हुए वे चार प्रभावी तंतु जो नये पौधेमें डालने होंगे। वे तंतु चार अलग अलग किस्मके पेड पौधोंसे चुने गए थे। एक तंतु तो ऐसी छोटी घासका था, जो अगले पंद्रह दिनके बाद अगले वर्ष तक सो जानी थी।
अगस्तीके पेडने आज्ञा दी - उन चार तंतुओंको लेकर नई घासकी प्रजाति बनेगी। उसे जमीनसे उगनेमें भी आठ-दस दिन लगेंगे। फिर उसे जानवरोंसे बचाते हुए बढाना पडेगा। इसकी जिम्मेदारी होगी बबूलकी कंटीली झाडियोंपर। एक महीनेमें वह घास पककर इन रोगी आदमियोंको रोग मुक्त करनेके लिए सहायक बनेगी। सोमवृक्ष ने इस घासको नाम दिया- असोका।
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असोका घासने अपने आस पासकी दूसरी घासोंसे केवल उस चेतनासंगमकी बात सुनी है। अगस्ती और सोम, दोनों पेड कबके ओझल हो चुके हैं। इसके अलावा कितने ही दूसरे पेड और पक्षी और जानवर भी। खुद असोका भी अब तक ढाई सौ बार सोकर जाग चुकी है। यानि मनुष्यकी भाषामें ढाई सौ वर्षकी हो गई है। उसने इतने वर्षोंतक उस लार टपकाने वाली महामारीके विषाणुओंको रोक रखा है। लेकिन आखिर कबतक? उसके आसपासके बडी आयुवाले पेड कट रहे हैं। उनके पास जो जानकारियाँ हैं, उतनी रखने लायक परतें असोकाके पास नही हैं - इसके लिये तो बडे बडे और पुराने वृक्षोंकी आवश्यकता है। उनकी परतोंमें ही लहरियों द्वारा लाई गई जानकारी सुरक्षित रह सकती है। इतनी छोटीसी बातको क्या मनुष्य प्राणी नही समझ सकता?

चंदरपुर गाँवमें पिछले तीन सौ वर्षोंमें हजारों परिवर्तन हुए। लेकिन असलमें उन्हें हजारो नही बल्कि एक ही परिवर्तन कहना ठीक रहेगा। वह ये कि चंदरपुरका बढ चढकर विस्तार हुआ। वह राजधानीका स्थान बना - यहाँ कई लडाईयाँ लडी गईं। व्यापारका केंद्र भी बना रहा। शिक्षाका भी। हर ओरसे विस्तार - बस यही थी चंदरपुरकी पहचान।
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बीसवीं सदीने अंगडाई ली। चंदरपुर अब देशका औद्योगिक केंद्र बन रहा था। राजकाजकी भाषा यहाँसे बनकर दूर दूर तक बोली जाती थी। समाज व्यवस्थामें कई परिवर्तन आए। अब राजा और राजपाट जैसा कुछ नही बचा। उसकी जगह लोकतंत्र आ गया था। घर बनानेके तरीके बदल गए। अब बाँसकी झोपडियोंकी जगह ईंटों और सिमेंटके मकान बनने लगे। पगडंडियों और गधोंकी सवारीके रास्ते बदल कर कोलतारके पक्के रास्ते बनने लगे। जात पात व्यवस्था चरम सीमापर थी। इसमें हरिया जैसे हुनरमंद चर्मकार या सुगीराम जैसे बढईके हुनरकी इज्जत नही थी। बल्कि चमडेका काम करनेके कारण उन्हें नीच कहा जाने लगा था। सीखनेके लिये लोग पेडोंके पास नही बल्कि स्कूलों और कॉलेजोंमे जाते थे। पेडोंने भी अब मनुष्यसे बातें करना बंद कर दिया था। लेकिन पेडोंके चेतनासंगममें अब भी मनुष्य और पशु पक्षीके रोगोंकी चर्चा होती थी। रोग निवारक प्रजातिके लिये आवश्यक तंतुओंकी छानबीन की जाती। जिन प्रजातियोंकें पास वे तंतु होते, उनसे उन्हें इकट्ठे कर नई प्रजाति पैदा की जाती। पेडोंने अपना धर्म नही छोडा था, लेकिन समस्या थी कि यह चेतना मनुष्यतक कैसे पहुँचाई जाये।
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इक्कीसवीं सदीने अंगडाई ली। चंदरपुर अब देशकी तीसरी राजधानी कहलाने लगा - पिछली सदीमें शिक्षा क्षेत्रका सबसे तेज दौर यहीं आया था। अब इन्फार्मेशन टेक्नोलॉजीमें भी सबसे आगे चंदरपुर ही था। चालीस परिवारोंसे बसे चंदरपुरकी लोकसंख्या अब हो गई थी चालीस लाख। दूर दूरतक जहाँ भी नजर जाती थी, कई मंजिले मकान, शॉपिंग मॉल, पक्के रास्ते, उन पर दौडती बसें, कार। समुद्रके अथाह प्रवाहकी तरह आते जाते लोग।

और लोगोंने कहना शुरू किया - ओफ्फोह, जनसंख्या कितनी बढ गई है, वाहन कितने बढ गये हैं, लेकिन रास्ते अब भी वही, पचास वर्ष पुराने, सँकरे रास्ते? अरे, कोई इन्हें चौडा तो करो।

महानगर पालिकाकी ऊंची अट्टालिकामें मीटींग हुई - रास्ते चौडे करो - प्लान बनाओ। एस्टिमेट बनाओ।
नगर विकास विभागके सर्वेयर दौडे - रास्तोंकी नाप जोत करो। गिनो पेड गिनो - कितने पेड काटने पडेंगे। गिनो, गिनो जरा।
कुछ ही लोगोंने बातको ध्यानसे सुना - क्या कह रहे हैं? पेड काटने पडेंगे? अरे, किस रोडके पेडोंकी बात रही है? उधर उस रोडकी? लेकिन वहाँ तो कई सुंदर पुराने पेड है - हाँ, डेढ दो सौ वर्ष पुराने भी।
और इधर इस रोडपर भी? हाँ, कालेज रोडपर भी और तुकाराम पादुका रोडपर भी। अरे, इतने पुराने पेड भी काटेंगे?

इक्कीसवीं सदीके मनुष्यको अब पेडोंसे बात करना नही आता था लेकिन कई मनुष्योंको पेडोंकी चेतनासे संवेदना आ जाती थी। वे कुछ कुछ महसूस करते थे। चंदरपुरमें भी ऐसे कुछ लोग इकट्ठे हुए - उन्होंने कहा - पुराने पेड मत काटो।
फिर सभाएँ हुईं। थोडे नारे लगे। थोडे लेख छपे। लेकिन महानगरपालिकापर दबाव बढ रहा था - रास्ते चौडे करो - शहरमें वाहन इतने बढ रहे हैं, उन्हें चलानेके लिए रास्ते चाहिये। पेडोंकी जमीन बेकार ही अडचन कर रही है। रास्ते दो, पेड नही, रास्ते दो, पेड नही।

कुछ लोगोंने फिर सुझाया - अरे, पेडोंको काटनेकी बजाए इन्हें रोड डिवाइडरकी तरह इस्तेमाल करो। उन्होंने महापालिका आयुक्त और पदाधिकारियोंसे मीटिंग की। लेकिन सबको रास्ते चौडे करनेकी जल्दी पडी थी।
एक एक कर चंदरपुरके सभी रास्ते चौडे हुए। एक एक कर सारे पुराने वृक्ष कट गए। उस एक वर्षमें चंदरपुरमें करीब तीन हजार ऐसे वृक्ष कटे जो पचास वर्षसे भी अधिक आयुके थे। उन्हें काटकर जो रास्ते चौडे हुए उनकी कुल लम्बाई थी दो सौ किलोमीटर।
असोका और उस जैसे कई नन्हें घासोंकी कई प्रजातियाँ भी रास्तेके नीचे दब गई। उनपर रेत, मिट्टी, पत्थर, टार और सिमेंटकी परतें बिछी। असोकाका दम घुट गया।
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सन् २०१० की मार्चकी एक सुबह। चंदरपुरमें लार टपकाने वाली महामारी एक बार फिर आई। लोगोंके हाथ, पांव, अंगुलियोंमें कंपकंपी भर गई। फिर गर्दन कंपकंपाने लगी।
अस्पतालमें रोगियोंकी संख्या बढने लगी। इस अजनबी रोगकी रोकथामके लिये दुनियाँ भरके वैज्ञानिक जुटने लगे।
उधर पक्षी जगतमें भी खलबली मची। सतर्कताकी सूचना फैली कि ऐसे रोगसे मरे व्यक्तीका शरीर इधर उधर पडा हो तो कोई पक्षी उसपर चोंच न मारे।
चंदरपुरमें जो भी पेड पौधे बच गए थे, सबने जल्दी जल्दी अपनी लहरियोंसे दुबारा चेतनासंगम जमानेका प्रयास किया । लेकिन अब वे एक दूसरेसे काफी दूर दूर थे और अनुभवमें छोटे। उनकी जानकारीकी परतें सीमित थीं। कोई भी पेड या पौधा दुबारा असोका घासके सृजनकी बात नही उठा पाया।
महामारी बढती गई - मुनष्यको खाती गई।
सन् २०११ की मार्च महीनेकी एक सुबह। आज चंदनपुरका हर मनुष्य या तो मर चुका था या शहर छोड कर भाग चुका था। चंदनपुर रह गया था खाली सिमेंट कांक्रीटके रास्तोंका शहर।
हरियाका चंदरपुर मर चुका था।
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कई वर्ष बीते। अब देशमे एक नई संस्थाके चर्चे थे। जैवविविधता बचाओ जत्रा - अर्थात् जैबज। स्कूली बच्चोंकी प्रभात-फेरियाँ निकालना और उनके मार्फत देशके विभिन्न ठिकानोंमे जैवविविधताका अध्ययन करना, दुर्लभ प्रजातियोंको तलाशना, इत्यादि इस संस्थाके काम थे। उनको हर्रेकी भी तलाश थी।
एक लेखकके पांडुलिपी संग्रहमे हरियाकी कथा थी। उसका देहावसान हुआ तो उसके बेटेने सारी पाण्डुलिपियाँ कबाडीको दे डाली। कबाडीकी लडकी जैबज ग्रुपकी सदस्य थी। कबाडीने सोचा ये कागज बेटीके लिए महत्त्वपूर्ण होंगे। इस तरह हरियाकी कथा जैबजतक पहुँची।
फिर एक दिन रंगबिरंगी पोशाख पहने हजारों लडके-लडकियाँ चंदरपुरमे आये - जैसे हजारों तितलीयाँ। किसीके हाथमे बैनर, तो किसीके हाथमे चित्र, किसीके हाथमे पौधा, किसीके हाथमे पानी, किसीके हाथमे कुदाल और फावडे।
दूर राजधानीके शहरसे पुरातत्व अधिकारी भी आए। उन्होंने निशानियोंसे पहचाना - यही है पुराना चंदरपुर। यही है उसकी नगर-सीमाके निशान, करो शुरुआत।
ढोल-लेझिमके तालपर, एकसाथ पौधे लगानेका कार्यक्रम शुरू हुआ। बच्चोंने लाखो बीज बोए - हजारों पौधे लगाए। चंदरपुर शहरके बीचो - बीच जैबजके साथ आया इकलौता हर्रेका पौधा भी लगाया। और असोका? उसका पता नही चला।
पर यही पेड बडे होंगे और बहुत साल सृष्टी पर रहेंगे। सालों साल वें लोगोंकी बिमारियाँ देखेंगे। बिमारियोंकी दवाई जिन जिन पेड पौंधोके पास है उनकी जानकारी ज्ञानतंतुमे इकठ्ठा करके रखेंगे। उनके चेतना-संगम होंगे। जब भी नई बिमारी या महामारीमें जरूरत पडेगी, सारे पेड पौधे अपने प्रभावी तंतु देकर बिमारियोंपर असर करनेवाली वनस्पतियाँ उगाएंगे। मनुष्य और प्राणियोंको बिमारीसे बचानेका पेड पौधोंका काम रुकेगा नही - चलता रहेगा।
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लीना मेहेंदले, १५ सुनिती, जगन्नाथ भोसले मार्ग, मंत्रालय के सामने, मुंबई - ४०००२१.
published in july 2007 in Aksharparv, Raipur and included in my colletion of short stories man_na_jane_manko, published by Alokparv prakashan New Delhi

शनिवार, 10 नवंबर 2007

भेकड मराठी कथा अंतर्नाद जाने 2010 टंकित


 अंतर्नाद जाने 2010 मधे प्रकाशित

भेकड

तो जंगलात रहात होता.

जंगलाचे नियमच वेगळे असतात.  कुणी कुणावर दबाव टाकत नाही कि जोर जबर्दस्ती नाही.  कुठेही कितीही वेळ भटका, वाटेल तेंव्हा घरी परता ! जंगल इतकं मोठ असत, तरी पण इथे रस्त्यांची ओळख करून घेणं खूप सोप असत.  आणि कधी मुख्य रस्त्यावरून भटकत दूर गेलो तरी पर्वा नाही.  घरी लौकर परतायची घाई नाही आणि घरापासून दूर रहाण्यांत फार धोकेही नाहीत !  निदान त्याच्यासाठी तरी नाहीतच !   तो शक्तिमान होता ! 

    पण शहराचे नियम वेगळे होते. त्याने ऐकलं होतं की शहरी लोकांनी शहरांना खूप गजबजून टाकल होतं आणि कठिण करून टाकलं होतं.  एक रस्ता चुकून दुस-या रस्त्यावर गेल  तर कळणारच नाही की आता परत कसं जायच.  जंगलांनी त्याला खूप कांही शिकवल होतं.  त्यातली अगदी प्रारंभिक शिकवण होती की आलेला रस्ता ओळखून त्यावरूनच कस परत जायच.  पण ज्यांनी शहरांचे थोडे फार नियम पाहिलेत ने सांगत असतात की शहरी लोकांचे रस्ते इतके गुंतागुंतीचे आहेत की जंगलातली कोणतीही शिकवण इथे उपयोगाची नाही.  त्यापेक्षा शहाणपणाची गोष्ट म्हणजे जो जंगलात स्थिर-स्थावर झाला आहे त्याने शहराकड़े ढुंकूनही पाहू  नये.

    याच जंगलात त्याच्या पाच पिढ्या राहिलेल्या आहेत.  त्याच्या आजोबांच्या आजोबांनी देखील शहरांबद्दल हेच ऐकलं असणार आणि ठरवून टाकल असणार की कधीही शहरांत जायचच नाही.  मग त्याच्या पणजोबांनी, मग आजोबांनी आणि बापानी देखील हेच ठरवून ठेवल असणार. पिढयान्‌ पिढया हीच शिकवण दिली गेली की शहरांपासून दूर रहा अन् सांभाळून रहा - जंगल हेच तुमचं घर आहे. 

    जंगलातच त्याच्या सर्व गरजा भागत असत.  जंगलात रहाणा-यांच्या गरजा असून असून किती असणार ?  त्यांना शॉपिंग मॉलची गरज नाही - पबची नाही -  इंटरनेटची पण नाही.  त्यांना बियर बारही नकोत आणि बार डान्सर्सही नकोत.  त्यांना मोटारी, मोबाइल किंवा सिनेमा पण नकोत.  खाणं आणि पाणी - बस्स.  तेच सर्वात गरजेच.  आणि हो, डोक्यावर एक छप्पर पण हवं.  पण जंगलात ते   पण सोयिस्कर मिळून जातं. 

    पण एक संकट येऊन ठाकलं होतं आणि ते शहरी माणसाच्या लालची स्वभावामुळे येणार होतं.  हल्ली शहरं अंदाधुंद वाढत चालली होती.  त्यांना प्रत्येक दिवशी हवी होती नवी घरं, नवे रस्ते, नव्या इमारती, नवे शॉपिंग मॉल्स, पार्किंग लॉट्स, हॉटेल्स ।  त्यासाठी पाहिजे जमीन.  शहरी लोकांच्या डोळ्यांत जमीनी भरत असत. मोकळया जागा, पार्क, खेळाची मैदानं, शाळांची पटांगणं, कम्यूनिटी सेंटर्स, आणि जंगल ! 

    कधीमधी शहरात जाउन येणारे सांगत की कशी शहरातल्या झाडांची कत्तल चाललेली होती.  बागा नष्ट होत होत्या.  शहरी लोकं त्या जागांवर उंच उंच टावर्स उठवण्यांत मग्न होते. ही तर चोरी होती. आणि सीनाजोरी अशी की त्याच पद्घतीने जंगलांवर देखील आक्रमण होत होते.  जंगलांच्या हक्काची गोष्ट कोण करणार? आधी शहरांत गेल्यावर तिथेही टेकडया दिसत- उंच, डेरेदार, जुने वृक्ष दिसत. जंगलातून कोणी गेलं तर घटकाभर विसावा घेण्याच्या त्या जागा असत. जंगलसारख कांही तरी वातावरण तर असायच.  पण आता तर शहरी लोकांनी त्यांच्या टेकडया पण कापून काढण्याचा सपाटा लावला होता. जंगलातून कोणी तिकडे गेलं तर आपलेपण वाटावं अस कांहीच शिल्लकं ठेवल नव्हतं. 

    या उलट जंगलावर मात्र त्यांचे आक्रमण धडाक्याने चालू होते.  जंगलाच्या आंत पक्के रस्ते, टूरिस्ट रिझोर्ट, या नावांखाली जंगलाच्या जमीनी शहरवाले बळकावीत होते.  जंगलातील आदिवासीच कांय, पण पशु पक्ष्यांच्या घरांच्या आणि, प्रजजनाच्या जागा देखील प्रदूषित आणि असुरक्षित होत चालल्या होत्या.  त्यांना कोण अडवणार ?  सगळे कायदे त्यांच्या बाजूने आणि कायदे तयार करणारे देखील त्यांच्याच बाजूने.

    शक्तिमानला या बाबी फारशा कळत नसत आणि त्याबद्दल फारशी चिंता पण नव्हती.  पण जंगलात रहाणा-यांच्यात चिंता व्यक्त होत असे.  त्या गप्पांमधे शक्तिमान भाग घेत नसे.  थोडफार ऐकल तर ऐकल.  ते पण त्याच्या डोक्यांत फार काळ रहात नसे. थोडस ऐकलं, सांगणा-याच्या चेह-यावरची काळजी वाचली. थोड़ा काळ मनात ठेवली- बस्स !  आपल्याला जर जायचच नाही शहराकडे तर या गोष्टींमधे डोकं कां शिणवा ?  त्याला लागणारं खाणं आणि पाणी जंगलात मुबलक आहे.  मनमुराद भटकायला जंगलाचा विस्तारही खूप आहे.  त्याच्याकडे शक्ति आहे.  मग त्याला काय कुणाची भीती आणि कांय कशाची चिंता!  

    पण अलीकडे कांही काळापासून शक्तिमानच्या मनांतही खळबळ होऊ लागली होती.  आपल्या चार-पाच पुतण्या - भाच्यांच्या दुर्दैवाच्या गोष्टी त्याच्यापर्यंत पोचल्या होत्या.  अगदी पहिल्या वेळचा किस्सा ऐकून तो फारच हळहळला होता.

    त्याचा लांबचा भाऊ - जंगलात भटकायला म्हणून गेला आणि अचानक शहराकडे वळला.  पण त्याचा तरी दोष म्हणावा कां ?  जंगलातील एक जागा - जिथे कधी काळी तो फिरायला किंवा खाण्याच्या शोधात जात असे - मधे तीन चार महिने तो तिकडे फिरकला नव्हता.  आणि जेंव्हा गेला . . . . त्याच परिचित जंगल संपल होतं.  त्या जागी मोठ्या इमारती उभ्या राहिल्या होत्या.  वळणा-वळणांचे रस्ते झाले होते - ओळखू येईल असं कांहीही शिल्लक राहिल नव्हतं - ना वृक्षराजी, ना गवत ! हां, एक छोटसं लॉन होत - त्यात फक्त थोडी हिरवळ दिसत होती .  भाई तिथेच बसून विचार करू लागला. पण जंगलाकडे परत कसं जावं ते समजेच ना !  लोकांचे डोळे चुकवून तो एका घराच्या उघडया खिडकीतून आत शिरला.  आणि हीच त्याची मोठी चूक ठरली .

    भाऊच्या मरणाचं वर्णन देखील शक्तिमान ने तुकडया-तुकडयात ऐकलं होत- थोडं याच्या तोंडून - थोडं त्याच्या तोंडून.  आणि प्रत्येक वेळा त्याच्या हृदयाला पीळ पडले होते.  शहरी माणसं एवढी क्रूर असतात ? एवढी क्रूर वागतात ?  कित्येक दिवस  शक्तिमान याच विचारात बुडला होता.  भाऊने कसे सहन केले असेल एवढे क्रौर्य ?  किती भ्यायला असेल ?  किती किंकाळया मारल्या असतील ? किती - पळायचा प्रयत्न केला असेल ?  कां - कां ?  निव्वळ त्याला शहरातून जंगलात परत येण्याचा रस्ता सापडूं शकत नव्हता म्हणून ? 

शक्तिमान ने जे कांही ऐकल त्यावरून हे तर निश्चितच होत की भाऊला जर रस्ता कळला असता तर तो परत आला  असता.  खिडकीतून उडी मारून ज्या खोलीत तो शिरला तिथे त्याला दर क्षणाला दचकायला झाल होतं.  खोलीच्या बाहेरचा ओरडा त्याच्यापर्यंत पोचत होता आणि पळत जाणा-या पावलांचा आवाज पण कळत होता.  लोक त्याच खोलीच्या आसपास पळापळी करत होते - जणू त्यांना माहीत होतं की खोलीत कोणीतरी अनोळखी शिरलेला आहे .  भाऊने खूप प्रयत्न केले की उडी मारून खिडकीपर्यंत पोचावं आणि तिथून पुन्हा बाहेर पडाचया प्रयत्न करावा.  पण त्याच्या उडया खिडकीपर्यंत पोचत नव्हत्या.  कितीवेळा तरी तो खाली पडला.  प्रत्येक धप्प आवाजागणिक बाहेरचा ओरडा वाढायचा.  कसवसं शेवरी एकदा तो खिडकीपर्यंत पोचला आणि तिथून बाहेर पळाला - एका अनोळखी रस्त्यावर.

    भाऊ पळण्यांत तरबेज होता.  पळत तो एका बाजूला जायचा -  शहरवासियांच्या एका जमावाला चुकवाचया!  पण तेवढयांत दुसरा जमाव, दुसरी टोळी त्याचा रस्ता अडवायची.  तो दात-ओठ खाऊन पळायसाठी शक्ति गोळा कराचया आणि लोकांना वाटाचया हा कुणावर तरी झेप घेणार.  लोक थोडे मागे सरकत .  त्याला पळण्यासाठी कुठेतरी फट मिळायची.  तरी पण शेवटी तो नि:शस्त्र होता.  लोकांकडे लाठया-काठया होत्या.  फेकून मारण्यासाठी दगड होते.  कितीदा तरी त्याला घेरून त्याच्यावर लाठ्या बरसल्या.  भाऊ पळत राहिला,  दु:खाने ओरडत राहिला, आणि भीत राहिला.  शेवटी चार तास झाले.  आता त्याच्यांत पाय उचलायचेही त्राण राहिले नव्हते.  त्याला स्पष्ट कळून चुकलं की आता ही सगळी माणसं मिळून त्याला पकडणार.  ठीक आहे, पकडू देत.  त्याला पकडून कैद केल आणि जंगलाच्या रस्त्यावर सोडून दिलं तर बरच  झालं.  इतका वेळ तो उगीचच पळत होता.  आता एकदा जंगलात जायला मिळाल की पुन्हा इकडे फिरकायच सुद्घा नाही ! 

पण नाही झालं तसं.  इतकी माणसं जी गोळा झाली होती -  त्यापैकी प्रत्येकाला त्याच्यावर एकदा तरी काठी मारायचीच होती.  तेवढयांत तिथे एक बंदूकधारी पण आला.  त्याने गोळया झाडल्या - तीन गोळया एक एक करून छातीत उतरल्या.  भाऊने  थोडया वेळातच प्राण सोडले.

इतर भाऊबंदांचे, जंगलवासियांचे किस्से सुद्धा कांही फार वेगळे नव्हते.   शक्तिमानच्या लक्षांत येऊ लागलं होत, की त्याच्याकडे देखील या समस्येवर कांही उपाय नव्हता.  त्याच्या लहानपणी जेवढं जंगल होतं, त्यापेक्षा गेल्या पंधरा वर्षांत ने कितीतरी पट कमी झाल होत.  याची फरियाद तरी कुणाकडे करायची?  कुणाकडे ऍप्लीकेशन नेऊन द्यायाचा ?  कुणाला नियम करायला सांगायचं की आम्ही जंगलवासी जर चुकून माकून तुमच्या शहरांत शिरलो तर आम्हाला मारू नका -- त्याऐवजी पुन्हां आणून जंगलात सोडा.  त्याचे जेवढे भाऊबंद किंवा अनोळखी जंगलवासी मारले गेले त्या सर्वांची कहाणी हीच होती अन् सर्वांची फिर्याद एकच होती व सर्वांची विनंति पण.  आम्हाला जगू द्या.  मारू नका. आमची जंगल हिसकावून घेऊ नका.  पण नाही - तस घडत नव्हतं - घडणार नव्हतं.  जंगलं छोटी होत चालली होती.  जंगलवासी चुकतच होते - भटकून शहरांत घुसत होते - परतीचा रस्ता  सापडण्याचा प्रश्नच नव्हता!  शहरवासियांना ऐकून घ्यायला वेळ नव्हता. शहरांत लपायच्या जागा नव्हत्या.  आणि शहरवासियांशी दोस्ती करणे तर शक्यच नाही.  ते कधीच कुणा जंगलवासियाला आपल्या समाजाचा भाग होऊ देणार नाहीत.  जंगलवासी कुठे त्यांच्याइतके स्मार्ट आणि बंदूरकधारी आहेत ? 

हा कसला न्याय म्हणायचा की शहरवासी हव तेंव्हा  जंगलात येऊ शकतात पण जर जंगलवासी शक्तिमान तिकडे गेला तर त्याला प्राण गमवावे लागतील.  असा कायदा होऊ शकत नाही कां की जंगलं तोडायची नाहीत -त्यांना वाढू द्यायचं - निदान त्यांच्या असलेल्या जागा तरी लाटायच्या नाहीत.   आणि सगळयांत मुख्य म्हणजे त्या जंगलाच्या आश्रयाने असणा-या शक्तिमान सारख्यांना निर्भंय राहू द्यायचं !  पण या प्रश्नांची उत्तरं नव्हती.

जंगलात पाण्याचे दोन स्रोत होते.  एक हरिपद तलाव आणि दुसरं 
झ-याच्या पाण्याने बनलेलं कुंड ।  शक्तिमान सध्या कुंडाच्या इलाख्यात वस्ती करून राहिला होता.  आई सांगाचयी, पूर्वी त्या झ-याला  बारा महीने पाणी असायचं.  पण चार पाच वर्षांपूर्वी जंगलातला एक मोठा पहाडच कापून काढला होता.  आधी त्या पहाडावरची मोठी झाडं कापून ट्रकवर लादली जात होती तेंव्हा शक्तिमानची आई आणि तिच्यासारखे अजून कित्येक काही न समजून येऊन बघत राहिले होते.  मग एक दिवस  मोठाले क्रशर्स आले.  पहाड कापायला सुरुवात झाली.  तिथती दगड-माती ट्रकातून भरभरून जाऊ लागली.  वर रहाणारे कित्येक जंगलवासी रडत - भेकत खाली वस्तीला आले.  तेंव्हापासून झ-याची धार देखील पातळ होऊ लागली.  आता तर तो चार-आठ महीनेच वहातो - अजून शेजारच्या डोंगरावर शहरी माणसाचा डोळा पडला नाही म्हणून. पण एक दिवस तो डोंगरही कापायला घेतील.  मग तर पुढल्या पंधरा वीस वर्षात हा झरा आणि हे कुण्ड दोघांचं अस्तित्व  संपून जाईल.  शक्तिमानने विचार केला की पुढल्या कांही दिवसातच आपण आपलं रहातं ठिकाण हलवाव आणि हरिपद तलावाशेजारी वस्तीला जाव हे बरं । 

पण तलावाकडे आल्यावर शक्तिमानचा आपल्या डोळयांवर विश्वास बसेना !  तलावाच्या कडेची सर्व झाड तोडली होती.  आता तिथे एक उंच भिंत बांधून काढली होती. शक्तिमान ने चारी बाजूंना फिरून बघितल. एकूण पाच लहान - मोठे दरवाजे होते.  भक्कम लोखंडी दरवाजे - त्यांच्या  वर टोकदार भाले बसवले होते - म्हणजे कुणी त्यांच्यावर चढून आत जाऊ  नये. घ्या !  शहरी लोकांनी पाण्याचा तलावच बंदिस्त केला तर जंगलवासींनी पाण्यासाठी जाचय कुठे ? 

बरच फिरून शक्तिमानला एक जागा सापडली, जिथे भिंतीला चिकटून अर्जुनाचा मोठा वृक्ष होता.  त्याने झाडावर चढून थोडी हिम्मत केली तर तो भिंतीवर उडी टाकू शकला असता आणि तिथून आत तलावाच्या पाण्याजवळ !
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व्हीसींना तातडीचे फोन घणघणू लागले.  "तातडीने या सर !  तुमची योजना यशस्वी झाली।" रूबाबात व्हीसी जायला निघाले.  त्यांची युनिव्हर्सिटी सुमारे दोनशे - एकरात वसवली होती.  पण तिथले तीन तलाव त्यांना पाण्याला अपुरे वाटले होते.  त्यांच्या सीमेला लागून जिथे जंगलाची हद्द सुरू होत होती तिथूत दीड किलोमीटर वरच हरिपद तलाव होता.  ते क्षेत्र जर युनिव्हर्सिटीला  मिळालं  तर हरिपद तलावाचे पाणी किती कामी येईल !  असी सदळी तर्कशुद्घ मांडणी करून आणि युनिव्हर्सिटी मधील दोन हजार विद्यार्थ्यांचा हवाला देऊन व्हीसींनी सरकारला पटवलं की जंगलाचा तो भाग देखील नव्व्याण्णव  वर्षांच्या भाडेपट्ट्याने युनिव्हर्सिटीला मिळावा.  सरकार कडून मंजूरीच पत्र आला तस त्यांचे अभिंनंदन करणारे कित्येक संदेश आले. लोकांनी माहिती पुरवली -- सर, त्या तलावावर पाणी पिण्यासाठी संपूर्ण जंगलातील प्राणी येतात .  आदिवासी वस्तीतली माणसं पण, जंगली  प्राणी पण आणि कधी कधी वाघ पण !

वाघाचे नांच ऐकताच व्हीसींचे डोके लकाकले होते.  कधी काळी त्यांचे पणजोबा चांगले शिकारी होते.  एक वाघ, तीन रानडुकरं, आणि काही हरिणं त्यांनी मारली होती.  आता पणतू ती पूर्वजांची गरिमा वाढयाला उत्सुक होता ..  ते स्वत: कांही बंदूक चालवूत शिकार करू शकणार नव्हते ।  पण  त्यांचा एक फिल्मी दोस्त होता. त्याला  त्याचा षौक पुरा करायची संधी देऊन दोस्ती दृढ करायची हीच वेळ होती.

व्हीसींच्या प्लान प्रमाणे भग हरिपद तलावा  भोवती भिंत बांधण्यात आली.  त्यांच फिल्मी दोस्त पण इकडे येऊन राहिला होता आणि वाघाच्या शिकारी साठी उतावीळ झाला होता . 

तलावावर पाणि पिव्यासाठी वाध आल्याची सूचना मिळनाच व्हीसी आणि त्यांचा दोस्त रवाना झाले.  जीप मधे बसून तलावापर्यंत आले.  एव्हाना तिथे बरीच गर्दी जमली होती.  काठया घेऊन बरेच विद्यार्थी एका गेटाजवळ थांबलेले होते .  प्लान बनला - गेट उघडून सर्वांनी आत जायचे.  ओरडा करून वाघला भिववायचे --  तो पळापळी करेल - मग फिल्मी दोस्त त्याच्यावर आरामात बंदूक झाडू शकेल.

शक्तिमानला लक्षांत आला की भिंतीवरून उडी मारून तो चूक करून बसला होता.  उलटी उडी मारून तो उंच भिंतीवर चढू शकणार नव्हता आणि भिंतीच्या अलीकडे, आंतमधे असा एकही वृक्षही नहता ज्यावर तो चढून तिथून भिंतीपर्यंत पोचू शकेल.  बुद्बिमान शहरी माणसांनी जंगलाच्या वाघाला बरोबर घेरलं होतं.  गेट उघडून झुंडीने विद्यार्थी आत आले आणि काठया परजत, ओरडा करत त्याला हुसकवू लागले.  शक्तिमान पळत राहिला, भीत राहिला.  शेवटी फिल्मी दोस्ताने बंदुकीच्या गोळया झाडून त्याचे शरीर पिंजून टाकले.  एक शेवटची मोठी डरकाळी, एक अर्धवट उडी, आणि शक्तिमान आपली भिती बरोबर घेऊन चिरविश्रांतिसाठी निपचित पडला.

एकच जल्लोष सुरू झाला.  त्यामधेच नगाडयाच्या घोषांत जणू पिपाणी असे दोन छोटे आवाज आले.  व्हीसींनी आश्चर्याने पहिले.  एक त्यांची मुलगीच होती तेरा वर्षांची - सातवीत शिकणारी - तिच्या हातात शाळेच पुस्तक पण होतं ! 

    "पापा, तुम्हीं वाघलो कां ठार मारलं? आमच्या पुस्तकात म्हटलय की पर्यावरण वाचवणे ही आपली जवाबदारी आहे.  वन्य प्राण्यांना मारून पर्यावरण वाचत नाही.  उद्या या वाघांची पूर्ण प्रजाति नष्ट होऊन जाईल - मग इतर प्राण्यांच्या  प्रजाति - आणि मग मनुष्य पण वाचणार नाही.  पापा, सांगाना, त्या दमलेल्या, तहानलेल्या आणि भ्यालेल्या वाघाला मारून आपण कांय बहादुरी केली ?  आपण भेकडच ठरलो ना ?  भ्यालेला होता तो. बंदुकीने त्याच्यावर गोळया झाडण्याऐवजी त्याच्यावर बेशुद्घीचे इंजेक्शन देणारे  बाण पण बंदुकीने फेकता आले असते.  मग आपण त्याला जंगलांत पाठवू शकलो असतो.  आपण तर इतके सगळे होतो.  तो भ्यालेला होता आणि आपण भेकड होतो- होय ना? पापा, सांगा ना - कां आपण मारलं त्याला ?  कांय मिळवलं ?

व्हीसींजवळ या प्रश्नाचे उत्तर नव्हते. 
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