सोमवार, 3 नवंबर 2014

हमें औजार दो

हमें औजार दो
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    " ये कहानी है एक कंपनी की जो दूसरी बडी कंपनियों से जॉब वर्क लेकर उनकी निर्देशित वस्तुएँ- अधिकतर कम्पोनंट और फिटमेंट  बनाती है, जिसका सालाना अर्थव्यवहार लाखो -------डॉलर्स का है , जिसमे ------ कर्मचारी है, जो अमरीका में 1956  में शुरु हुई।"

“तो क्या हो गया?”

    " कभी उस कंपनी के कर्मचारियों ने मिलकर एक क्रेडिट सोसाइटी बनाई । एक महिला कर्मचारी ने उनसे कर्जा लेकर अपने लिये कार खरीदी और तबसे वह अपनी कार में ही फॅक्टरी आती है ।"

“तो क्या हो गया?”

     " वह कहती है- अब मैं ने जाना मुक्तता क्या हैं स्वच्छन्दता क्या है ।"

“हां, औरतों  को कई बार आत्मविश्वास के लिये ऐसी- बातों की जरुरत पडती है।”

"वह महिला अपंग है।"

“ओs”
 
"   सुबह कोई उसे व्हील चेअर समेत उठाकर कार में बैठा देता है। वह कार चलाकर फॅक्टरी आती है , तो कोई उसे उतार लेता है। शाम को लौटते समय फिर वही व्यवस्था।"

“अरे?”

"   वह कहती है स्वच्छंदना का अर्थ जैसा मैंने समझा, शायद ही किसीने समझा होगा।

“उसे मेरा सलाम, ठीक कहती है वह !”
 
" जिस फॅक्टरी में वह काम करती हैं, उसमें मालिक से लेकर हर कोई अपंग है कोई पांव से, कोई हाथ से , कोई कान से, कोई आंख से!"

   “ये कौन सा तरीका है कहानी कहने का?”

 "वे सभी मानते हैं कि वही हैं सबसे सक्षम क्यों कि वे हतबलता से लडकर जीतना जानते हैं ।"
   
 “ठीक कहा वे जिन्दगी को जानते हैं।”
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     लेकीन यह  कहानी1956   से नही बल्कि 1912  से आरंभ होती है , जब हेनरी विस्कार्डी ज्युनियर का जन्म हुआ और माता पिता  को देखा कि नवजात बालक की टांगो की जगह केवल दो ठूंठ थे।
      अगले सात वर्षों तक एक के बाद एक ऑपरेशन । अस्पताल ही घर । लेकिन अस्पताल में था प्यार,उष्मा , उसकी जरुरतोंका ध्यान रखने वाले लोग।
     अपने घर लाया जाना और आस पडोस की चुभली नजरों के सामने कुछ लोगो के पास उसके लिये पडना- दोनो उसके लिये नई बातें थी। फिकटे, शरारते , क्ररता थी तो कु छ के पास बेपनाह दया । क्रूरता के साथ वह लड सकता था - हार भी जाता तो भी - एक संतोष लेकर कि उसने बिना लडे हार नही मानी । व्यंग को घूँट की तरह पी जना पडा तो भी- संतोष - रहा कि उसने कडुवे घूंट के बावजूद चेहरे पर हंसी बनाये रखी ताकि व्यंग कसने वाला उस पर  हंस न सके  । उसे व्यंग से , फिकरों से क्रूरता से नफरत नही हुई।
    लेकिन उस पर उंडोली जाने वाली दया असह्य थी । उसे अपमानित करती थी , और वह उससे लड भी नही पाता । उसके जीवन की तमन्ना बन गई - कि वह दुनियाँ के सम्मुव्त एक साधारण व्यक्ति की तरह खडा सके और कह सके - लोमैं तुमसे तरह पेश आ सकता हूँ।
      और ऐसा संभव भी हो गया । डाँक्टर ने हेन्टी के लिये अलयुमिनियम के दो पौर बनाए जो उसके घुटनों पर फिट बौठाई गए । आँपरेशन के बाद पहली बार हेन्टी बिस्तर से उतरा तो उसने देखा कि अब वह छः फुट  दो इंच कद का एक भरपूरा आदमी  था । किसकी नजर से नजा मिलाकर बात करना कितना आसान और कितना आनंददायी -था ।
    लेकिन जब डाँ की फीस चुकाने का  क्षण आया तो उन्होंने मना  कर दिया - हेनी, मौ मानता कि जब तुम भी -किसी और के लिये कुछ ऐसा ही कर सको , तो मौ समझूगा कि मेरी फील मिल गई । सौदा महंगा था। कई बार ः कई लोगों के लिये  कई माह से कुछ कत्ने के बाद हेनी ने पाया कि यह फीस तो चुकाए नही चुक रही । लेकिन उस ऋण  में रहना भी आनंददायी ही रहा।
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(भाग 2 )

हमारी इस कंपनी का एक नाम भी है। लेकिन अभी कुछ समय के लिये मैं इसे दूसरा नाम देना चाहती हूँ। तो हम इसे क्ष कंपनी
 के नाम से बुलायेगें - क्ष से क्षमता।
बात है कुछ बुरे समय की । कंपनी के बुरे दिन चल रहे थे। पिछले जमाने की एक सफल हो चुकी मुहिम के कारण कंपनी को 
काम और पैसे मिल रहे थे लेकिन कुछ निराशा जनक काम भी हो रहे थे जैसे फोर्ड इन्स्टूमेंट कंपनी के लिये स्लिप रिंग बनाने 
का काम। क्ष कंपनी के कारीगरों के लिये यह नया काम था जिसके गुर उन्हें सीखने थे।
स्लिप रिंग बनाने के लिये पहले प्लास्टिक पाउडर की एक बुलेट बनानी पडती हैं। इसके लिये पहले चाहिये बुलेट के नाप की 


एक “खोल” (डाइ) । खोल में प्लास्टिक पाउडर भर कर उसे उंचे तापक्रम व उच्च दबाब पर गरम करते हैं जिससे प्लास्टिक 

पाउडर पिघल कर खोल का आकार धारण करे। फिर खोल को ठंडा कर उसे दुबारा दबाव देकर तोडा जाता है ताकि प्लास्टिक 

की बुलेट हाथ लगे। फिर उसमे तीन प्लॅटिनम की चूडियाँ जोडते हैं जिनपर कनेक्टिग तार सोल्डर किये रहते हैं। 

यह तय हुआ कि कंपनी का एक “ मुखिया” फ्रँक, फोर्ड कंपनी के कार्यस्थल पर कुछ दिन बिताकर जानकारी लेगा जबकि कंपनी

 का सीएमडी और दूसरा डायरेक्टर सारी “खोल” बनाने वाली कंपनियों को खंगालेंगे ।

सो “क्ष” का सीएमडी अपनी कुबडियों पर और डायरेक्टर जिसका नाम आर्ट था, अपनी व्हील चेयर पर निकल पडे। ब्रूकलिन

 तथा लाँग आयलण्ड की इन्डास्ट्रियल एरिया में खोल बनानेवाली कई फॅक्टरियाँ देख डालीं। 

“तुम्हें यह काम मिल रहा है ? तब तो तुम्हें शुभकामना के अलावा कुछ नही देना चाहता। ” एक फॅक्टरीवाले ने कहा।

“हम ये वाले खोल बनाने का काम ही नही ले रहे, फिर तुम बुलेट बनाने का काम कैसे कर सकते हो?” दूसरे फॅक्टरी मालिक ने 

कहा । वही बात और भी कईयों ने दुहराई।

-------------------------------------------------------------- (आज इतना ही)

     उधर फ्रँक अपना  “इन्पेक्शन” पूरा करके फोर्ड कंपनी से वापस आया तब सबको पता चला कि स्लिप  रिंगके नमूने और  परिमाण (स्पेसिफिकेशन) तो अभी तय होने बाकी थे।  फोर्ड कंपनी की अपनी शोध - प्रशाला में प्रयोग चल  रहे थे । खोल तोडने के लिये उनका जो दबाव-यंत्र (प्रेस) था, वह हाथसे चलाने वाला हाइड्रोलिक पम्प था जो प्रयोग शाला के लिये चल सकता था परन्तु बडे पैमाने पर उत्पादन करने के लिये नही। कुल मिलाकर सब कुछ आरंभिक स्तर पर ही था। फिर भी कंंपनी को काम की जरुरत थी और फ्रँक को  लगा कि  कंपनी ये ठेका ले सकती हैं। उसने थोडे लोगों के साथ अपनी टीम बनाई और काम  में जुट गया।

         “ खोल तोडने”  का काम   ओलाफसन को सौंपा गया। वह एक भीमकाय व्यक्ति था जो गठिया से बुरी तरह त्रस्त था। खासकर रीढ की हड्डी के मुडने से वह झुका झुका रहता था और गर्दन में पडी ऐंठ के कारण उसे गर्दन घुमाने में भी दिक्कत थी। उंगलियां भी मानों स्पॅनर हों ऐसी ही थीं। लेकिन किसी जमाने में वह एथलीट रह चुका था इसलिये काम के अनुरुप शरीर को मोड लेना उसे बखूबी आता था। उसे बैठने  के लिये ओक की मजबूूत लकडीसे एक भारी भरकम कुर्सी बनाई गई थी जिसमें मजबूती के लिये स्टील प्लेट भी लगी थीं।उसे काम करने के लिये कम उंचाई वाला एक खास बेंच भी कंपनी ने बनवाया था। उसी पर वह खोल तोडनेवाला हाइड्रॅालिक पम्प फिट  किया गया।
            ओलाफसन अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए उस हाथ पम्प को चलाता था ताकि खोल टूटे। फिर अपनी मुडी-तुडी उंगलीयों से बडी सफाई से प्लास्टिक का बुलेट बाहर निकालता।

       टीम का दूसरा सदस्य था बिल  विगाम। सिर की चोट के कारण उसके मस्तिष्क  और हाथोंका समन्वय टूट  चुका था। वह  जो कुछ भी उठाने जाता, वही चीज गिर जाती।  लेकिन हाथ-पम्प के हॅण्डल को वह दबाये रख सकता था। सो तय हुआ कि वह और फ्रँक एक बेंच  पर  एक साथ काम  करेंगे। फ्रँक के हाथ पोलियो के कारण लूले पडे थे, लेकिन उंगलियों में कौशल्य था। जब  बिल हाथ-पम्पको चलाता तो फ्रँक शीघ्रता से खोल को अन्दर करता , फिर टूटे खोल को खींचकर  उसमेंसे बुलेट को बाहर निकाल  लेता था ।

           इस  प्रकार  काम की शुरुआत हो गई तो बिल की इच्छाशक्ति जागी। उसे यह मंजूर  नही था कि चूँकि उसके हाथ चीजोंको नही उठा सकते इसलिये उसे फ्रँक के साथ काम बाँटना पड रहा है। वह लंच टाइम में अपनी उंगलियों से चीजें उठाने की और उन्हें एक मिनट - दो मिनट बिना गिरने दिये पकडे रहने की प्रॅक्टीस  करने लगा।  धीरे धीरे उसकी  उंगलियों में वह समन्वय आने लगा। तब बडे गर्व के साथ एक खोलको कस कर मुठ्ठी में दबायें वह सीएमडी के पास पहुँचा और अपना हक  जताया कि अब वह  अपने हाथपम्प पर  अकेला ही काम करेगा।
         उसकी बात रखने के सिवा क्या चारा था ?  क्ष कम्पनी ने  फोर्ड कंपनी से एक और हाथपम्प उधार माँग लिया । लेकिन अब नई समस्या ये हुई कि फ्रँक उसे अकेले कैसे चलाये? ऐसे समय कंपनी  के दूसरे डायरेक्टर  वॅडस्वर्थ का कौशल्य काम आया। उसने हाथपम्प में रेसिप्रोकेटिंग  एअर सिलिंडर लगाये- अर्थात एक  सहायक पम्प जिसके कारण इस नये पम्प को चलाने के लिये अत्यल्प शक्ति की आवश्यकता होती थी जो फ्रँक  के बसकी बात थी ।
     
आर्ट भी व्हील  चेयर में बैठे- बैठे अपना दिमाग  काफी चला सकता था। उसने देखा कि गरम खोल को ठंडा करने के लिये पानी में रखते हैं, इंतजार करते हैं, और  गरमाये पानी को कई बार बदलना भी पडता है। उसने खोल ठंडा करनेवाले इन  बरतनों को फॅक्टरी के प्लंबिग सिस्टम से जोड दिया ताकि उनमें पानी हमेशा बहता रहे और अपने आप ठण्डा होता रहे।
       
लेकिन काम के तरीकोंकी इतनी प्रगति होते होते कई दिन बीत चुके थे और बीत रहे थे, और क्ष कंपनी का पैसा खर्च हो रहा था । अब कुछ  कारागीर  काम सीख चुके थे । पहले दिनकी तुलनामें उनकी उत्पादकता दुगुनी हुई थी।  काम की क्वालिटी  भी सुधर गई थी । अब समय था कि फोर्ड कंपनी के साथ  काण्ट्रॅक्ट की शर्ते दिखाकर मोटी  ऑर्डर ली जाये ।
       
लेकिन टांय टायं फिस्स। हालाँकि फोर्ड  कंपनी को क्ष कंपनीपर भरोसा भी था और सहानभूति भी, लेकिन उन्हें जहाँ से स्लिप - रिंग के ऑर्डर  मिलने वाले थे,  उसी कंपनी ने अपना वह काम समेट लिया था। सो फोर्ड को भी क्ष कंपनी का  काण्ट्रॅक्ट रद्द करना पडा।
        उद्योजकता में  टिका रहना  हो तो ऐसी घटनाओं पर आप शिकायत नहीं  कर सकते , न ही हार मान सकते हैं।  
कबीरा, चल खोज दूसरी बाट।
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सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

आटपाट देशांतील टोल संस्कृतीच्या पाऊलखुणा

Jan 1 2011

आटपाट  देशांतील  टोल  संस्कृतीच्या  पाऊलखुणांची  गोष्ट

      आटपाट देश होता- त्याचे नांव भारत. तिथे दर दोन-तीन वर्षांनी पूर यायचा किंवा दुष्काळ यायचा. लोक म्हणू लागले हा ग्लोबल वॉर्मिंगचा प्रभाव दिसतोय. चला रे चला, ग्लोबल वॉर्मिंग थांबवू या. मग त्या देशांत खूप उत्सव होऊ लागले. “ग्लोबल वॉर्मिंग थांबवण्यासाठी उत्सव ”. उत्सवांसाठी निवडलेल्या दिवसांना सुंदर- सुंदर नांवे देण्यांत आली- कधी वसुंधरा- दिवस, कधी-खाद्य- आपूर्ति- दिवस, तर कधी उर्जा संरक्षण दिवस.
    लोक मोठ्या संख्येने या उत्सवांना हजेरी लावत. रंगीबेरंगी कपडे घालून व रंगी बेरंगी फुगे हाती घेऊन लोक येत. ज्यांना  घरूनच फुगे आणता आले नसतील अशांना सोईसाठी उत्सव- स्थळावरच फुगे विक्रीची सोय असायची. शिवाय तऱ्हे तऱ्हेचे खाद्य पदार्थ, गृहशोभेच्या वस्तू पण विक्रीसाठी असायचे. झोपाळे कांय, जायंट व्हील कांय, सर्व असायचे. उत्सव दिवसाबरोबरच कधी कधी ग्लोबल वॉर्मिंग थांबवण्यासाठी फ्रेंडली क्रिकेटमॅच पण खेळल्या जात - त्या पहायला देखील लोक गर्दी करत. घरी परत जातांना सर्व जण त्या आनंदोत्सवांची प्रशंसा करीत आणि आता ग्लोबल वॉर्मिंग नक्की थांबेल असा विश्वास घेऊनच घरी पोचत.
     या भारत देशांत चांगले रस्ते असावेत अस बाटून सरकारने रस्ते बांधणीचा कार्यक्रम हाती घेतला. सुरवातीला गांवा-गावांना जोडणारे छोटे माती व मुरुमाचे रस्ते  होऊ लागले पण लौकरच
सरकारला वाटल की आपणमोठ्या पल्ल्याचे लांब रुंद रस्ते बांधावे म्हणजे त्यावर मोठ्या प्रमाणात वाहतूक होऊ शकेल. वाहतूक वाढली की प्रगति वाढेल. मग सरकारने मोठे रस्ते बांधायचा कार्यक्रम हाती घेतला. त्यासाठी एक वेगळी कंपनी कायम केली. तिचे नाव भारतीय रस्ते बांधणी निगम. त्या कंपनीकडे चांगले इंजिनियर व चांगले अधिकारी दिले व सांगितले रस्ते बांधा. पण पैसे
कुठून आणायचे? आणि रस्ते बांधायला जरी पैसे आणले तरी दरवर्षी तूटफूट होईल, त्या दुरुस्तीसाठी पैसे कुठून आणणार? अशा वेळी काही विदेशी कंपन्या पुढे आल्या त्यांनी निगमला सांगितले- आम्ही कर्जाऊ पैसे देणार नाही, पण ठेका दिलात तर काम करुन देऊ. तुम्ही ठेक्याचे पैसे देऊ नका, फक्त लोकांकडून वसूल करायची परवानगी द्या. सरकारने तशी परवानगी देण्याचे ठरवले. तरीही विदेशी कंपन्यांना खुल्लम खुल्ला भारतात व्यापार करु दिला तर जनता पुन्हा एकदा ईस्ट इंडिया कंपनीच्या आठवणीने हवालदिल होईल किंवा कदाचित बिथरेल म्हणून मग ठरल की या विदेशी कंपन्यांनी एखाद्या भारतीय कंपनीच्या बरोबर नवीन कंपनी उघडावी त्यात भारतीय कंपनीचा वाटा किमान पंधरा टक्के असावा व रजिस्ट्रेशनही भारतात असावे. मग मंत्र्यांनी भराभर आपले चुलते- पुतणे यांना अशा विदेशी कंपन्यांचे पत्ते देऊन त्यांच्या जोडीने नवीन कंपन्या रजिस्टर करायला सांगितल्या. अशा
तऱ्हेने एकदाची नवीन ठेका- नीती  मंजूर होऊन पैसे कुठून आणायचे हा प्रश्न सुटला व टेंडरे मागवण्यांस सुरुवात झाली.
     भारत देशांत पूर्वी देखील ठेके देऊन बांधकामे करून घेण्याची पध्दत होतीच. मात्र त्यावेळी सरकारी खात्याकडील यंत्रणेला निरनिराळ्या विषयातील तज्ज्ञ लागत. स्ट्रकचरल इंजिनियरींगचे   तज्ज्ञ असत, ते डिझाईन ठरवत. रस्ता नेमका कुठून जाईल, वाटेत खाचा- खळगे, डोंगर- दऱ्या, नद्या- ओढे कांय आहेत? तिथले बांधकाम कसे असेल? जे कांही लोखंड, वाळू, सिमेंट वापरल जाईल त्याची प्रत कशी असेल? प्रत्यक्ष काम करणारा ठेकेदार वेगळा असला तरी कामावर देखरेख करणारा इंजिनियर तज्ज्ञ हा खात्यातीलच असायचा. वापरलेले मटीरीयल कसे आहे, केलेले काम कसे आहे? रस्त्याचे कॉम्प्रेशन नीट व्हायला हवे तर त्यासाठी जो कॉम्प्रेसर लागेल तो आवश्यक क्षमतेचा आहे की नाही? रस्त्याला ग्रेडियंट असेल तर तो एक सारखा ठेवला आहे ना, पूल बांधला असेल तर तो भक्कम आहे ना? रस्त्यावर पाणी आले तर ते तत्काळ वाहून जाण्यासाठी साइड- ड्रेन्स व्यवस्थित आहेत ना? अशा शंभर गोष्टी पारखण्याची व योग्य प्रकारे करवून घेण्याची क्षमता सरकारी इंजिनियर मधे असावी लागे.
      रस्त्याच्या बांधकामासाठी लागणारे चार महत्वाचे घटक सरकारच्या ताब्यांत असत- माती, मुरुम, वाळू आणि दगड! ठरलेल्या कामावर हे घटक किती प्रमाणात लागणार आणि ते कुठून आणायचे हे देखील बांधकामाची आखणी करतांना ठरलेले असायचे. या पैकी वाळू मिळण्याची जागा म्हणजे नद्यांचे पाय आणि माती, मरुम, दगडाची जागा म्हणजे डोंगर. या चारही छटकांवर फार पुरातन काळापासून राजाची मालकी ठरलेली होती, त्यामुळे स्थानिक महसूल व वन अधिका-याच्या परवानगी शिवाय हे घटक उपसता येत नसत. कोणी उपसलेच तर त्यासाठी जबर्दस्त दंड आकारणीची शिस्त होती.
      पण नवीन ठेका नीति आल्यावर या कोणत्याच तज्ज्ञतेची किंवा शिस्तीची गरज राहिली नाही असे सरकारला वाटू लागले. ज्या ठेकेदाराने रस्ता बांधायचा, त्यानेच त्याचा मेंटेनन्स करायचा व आपला सर्व भांडवली खर्च तसेच दैनंदिन खर्च आणि नफा रस्ता वापरणाऱ्या वाहनांकंडून टोलच्या स्वरुपांत वसूल करायचा.  अशा तऱ्हेने चांगला रस्ता बांधल्याने ठेकेदाराचाच मेंटेनन्स खर्च वाचतो, सबब तो रस्ता चांगल्यात चांगल्या प्रकारेच बांधणार. शिवाय टोल-काळापर्यंत मालकी त्याचीच असणार- मग  बांधकामावेळी  सरकारी देखरेखीची  गरज कांय? तज्ज्ञ इंजिनियर पोसायचा भार सरकारने घेण्याची गरज नाही, असाही सिध्दान्त पुढे आला. आपल्या कडील कर्मचारी वर्ग मोठ्या प्रमाणावर कमी करण्याची संधी मिळाली म्हणून सरकारनेही आपली पाठ थोपटून घेतली. रस्ते बांधणीसाठी माती, मुरुम, दगड व वाळू कुढून आणावे याचे प्लानिंग करण्याची सरकारी खात्यांना गरज राहिली नाही. ती काळजी ठेकेदारानेच करायची.
      नवीन ठेका नीतीला कुणालाही ठेका मिळण्याची  अट होती- धनदांडगाई . अर्थातच या एक नसून  दोन अटी होत्या. एक अट धनाची- तुमच्याकडे खूप पैसा हवा. म्हणून तर विदेशी कंपन्या हव्यात, कारण देशाचा सर्व पैसा विदेशी बॅकेत आहे- बेनामी पण आहे. दोन-पाच कंपन्या सोडल्या तर देशांत जागतिक तोलामोलाच्या धनिक कंपन्याच नाहीत. आहेत त्यांना सर्व ठेके देता येत नाहीत.
     दुसरी अट होती दांडगाईची. याच साठी गरज होती राजकीय सत्तापदे हातात असण्याची.
 याचसाठी विदेशी ठेकेदारांनी आपले भारतीय पार्टनर निवडतांना मंत्रीपुत्रांना व सत्तापुत्रांना प्राधान्य दिले. खूप प्रमाणात ही सत्ता नोकरशाहीच्या हातात होती. त्यांना उघडेपणे पार्टनर होता येत नव्हते. पण निवृत्तीनंतर लठ्ठ पगाराची कन्सल्टंसी त्यांना पुरणार होती. अशा प्रकारे दांडगाई मधील त्यांचा सहयोग स्वागतार्ह होता.
      ठेक्यात नफा किती मिळेल हे त्या दांडगाईच्या तंत्रावरून ठरणार होते. दांडगाइतील पहिली चढाओढ रस्ते मिळण्याची होती तर दुसरी चढाओढ जास्तीत जास्त काळासाठी टोल-वसूलीची होती.
     अशा वातावरणात एक हुषार ठेकेदार होता. त्याने एक अभिनव धोरण आखले. ठेक्याच्या अटी- शर्ती नमूद करतांना इतरांचा अंदाज घेऊन कमीत कमी काळासाठी टोल मागायचा, व ठेका पदरांत पाडून घ्यायचा. त्यानंतर नोकरशाहीच्या सोबतीने वाटाघाती करुन ठेक्यामधील काम जुजबी प्रमाणात वाढवून घ्यायचे- या वाढीपोटी टोल वसूलीसाठी टेंडरमधे नमूद असलेल्या  काळांत  दुपटी-तिपटीने वाढ करून घ्यायची. हा पुढील व्यवहार लोकांच्या नकळत असायचा. ठराविक अधिकारी व मंत्र्यांपलीकडे ही माहिती कुणाला नसायची.
      असे म्हणतात की "जो न देखे रवि, सो देखे कवि!” म्हणूनच वरील हुषारी ही  कथालेखकाला दिसलेल्या कित्येक पाऊल खुणांपैकी  एक होती. पण दुसरीकडे कथालेखकाला दिसत होते की आटपाट भारत देशांत जन्ता नावाच्या प्राण्याची वेगाने वाढ होत होती. हा प्राणी टोल संस्कृतीबाबत   प्रश्न उठवत होता, नांगीने फटकारत होता- मुठी वळत होता. दुसरीकडे कायदा नांवाचा एक अहिंसक पण शक्तिशाली प्राणी देखील होता- हत्तीसारखा- तो ही प्रश्नचिह्न उमटवत होता, या टोल- संस्कृतीवर.
      तर विचारणीय मुद्दा असा की जन्ता प्राणी, कायद्याबरहुकूम वागून- त्याची मदत घेऊन कांय-काय करू शकतो? पाऊलखुणा तर खूप आहेत टोल संस्कृतीचे दुष्परिणाम दाखवणा-या   आणि त्या सुधारून  सुपरिणाम आणायसाठी योग्य दिशा   दाखवणा-या  देखील.
     कथा लेखकही अजून कित्येक कथा लिहीत बसलेला आहे. पाहूया कोणता कथा संग्रह हाती लागतो ते.
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रविवार, 15 जून 2014

आजही द्वारिका

आजही द्वारिका

श्रीकृष्णाने सकाळची सर्व कामे आज लवकर संपवली होती. राजसभेतील चर्चेतही फारसा भाग घेतलेला नव्हता. आजचा दिवस निर्णायक असेल असे राहून राहून वाटत होते. होऊन जाउ दे तसेच. घेऊन टाकायचा काही तरी निर्णय. ही अनिश्चिततेची स्थिती कधी तरी संपायलाच हवी. “ती माझ्याशिवाय कोण संपवणार? श्रीकृष्णाने मनाला विचारले. 

हस्तिनापुरीची शिष्टाई  निष्कळ ठरली होती. ती तशीच ठरावी अशी द्रौपदीची इच्छा होती. युधिष्ठिराने युध्द टाळावे यासाठी प्रस्ताव केले होते. राजसूय  यज्ञ करणा-या मोठ्या साम्राज्याच्या सम्राटाने फक्त पाच गावांचे राज्य दिलेत तरी चालेल असा निरोप काका धृतराष्ट्र यांना पाठवला होता, त्यावर सुईच्या आग्रभागावर टिकेल एवढी जमीन सुध्दा देणार नाही असे म्हणत दुर्योधनाने तो प्रस्ताव धुडकवून लावण्यास धृतराष्ट्राला भाग पाडले होते. त्यानंतर पुन्हा एकदा सामोपाचाराचा प्रयत्न करावा  म्हणून युधिष्ठिराने शिष्टाई साठी कृष्णाला गळ घातली होती. तेव्हासुध्दा युद्ध टाळावे हीच भूमिका व पाच गावांवर समाधान मानू हाच निरोप कृष्णामार्फत देण्याचे ठरले होते. 

पण द्रौपदी आपले मोकळे सोडलेले केस हातात पुढे धरून त्याच्यासमोर ठाकली होती. दुःशासनाने  तिचे मोकळे  केस धरून  फरफटत सभागृहात आणले आणि भरसभेत अपमान केला ते शल्य विसरणे कसे शक्य होते?  “कृष्णा, हे मोकळे केस बघ,  दुःशासनाने केस धरून सभेला आणले तेव्हा भीमाने प्रतिज्ञा केली  होती की दुःशासनाचा वध करून त्याच्या रक्ताने तुझे केस माखून तुझी वेणी घालून देईन । ती प्रतिज्ञा भीम  विसरलेला नाही - मी ही विसरलेली नाही . पण आता युधिष्ठिर शांतीचा व युद्ध टाळण्याचा प्रयत्न करीत आहे. युद्ध झालेच नाही तर ती प्रतिज्ञा अपुरी राहील आणि जन्मभर मला मोकळ्या केसांनीच वावरावे लागेल.” 

अवाक् होऊन सर्वजण ऐकत होते. युधिष्ठिराच्या शब्दाविरूध्द बोलण्याची प्राज्ञा इतर चार पांडवांची नव्हती . पण द्रौपदी म्हणजे सळसळती वीज होती. एरवी मेघांच्या पोटांत दडून राहणार - शांत, गुप्त, पण प्रकट झाली की क्षणार्धात सर्वांना लखलखाटाने दिपवून टाकणार. तिच्या तेजापुढे  प्रसंगी कृष्णाला ही नमते घ्यावे लागले होते, मग युधिष्ठिराची काय कथा?
                                 
कृष्णालाही द्रौपदीचा मुद्दा मान्य होता. (कुन्तीचे मत ??)
शिष्टाईला गेलेल्या श्रीकृष्णाच्या अपेक्षेप्रमाणेच दुर्योधन  वागला होता.
                                  2
मसूरी 1984.
गेल्या महिनाभर तयारी  करीत असलेली , तरीही जराशी सुस्तावलेली लाल बहादूर शास्त्री नॅशनल अकादमी सकाळपासून गजबजून गेली होती. नवीन बॅचचे प्रोबेशनर्स सकाळपासून निरनिराळ्या वाहनातून येऊ लागले होते. कुणी  चक्क यूपी स्टेट ट्रांस्पोर्टच्या बसमधून तर कुणी टॅक्सी, कुणी एसी कॅब व कुणी पालकांच्या आलीशान गाडीने प्रवास करून येत होते. देशाच्या कानाकोप-यातून आलेल्या तरूणी- तरूण मंडळींचा  उत्साह ओसंडून वहात होल. आणि का नाही? देशाच्या सर्वोच्च सिव्हिल सर्व्हिस परिक्षेतून निवडलेली क्रिम आफ क्रीम अशी ही मंडळी होती . 
अणिमा आणि राधा  चेन्नईहून एकत्रच आल्या होत्या. रेलवे स्टेशनवरच त्यांची गाठ पडली होती, आणि त्यांना एकमेकींची साथ मिळाली म्हणून दोघींच्या पालकांना हायसे वाटले होते. अणिमा ही एका केरळच्या एका खेडेगावांतली मुलगी- शिक्षणासाठी त्रिवेंद्रम पर्यंत जाऊन आलेली.  तिथे मामाच घर बरं की कॉलेज बरं.  पण परदेशस्थ चुलत  भावाच्या प्रेरणे ने आय. ए. एस होण्याचे स्वप्न 
मात्र पाहिले होते आणि स्पर्धा परिक्षेची नीट तयारी करवून घेणारे शिक्षकही लाभून गेले होते. 
रेलवेचा हा सर्व प्रवास तिला नवखा होता.  फारशी काळजी किंवा चिंता करण्याचा तिचा स्वभाव नाही, पण गाफील राहूनही चालणार नाही या जगात.  आज एक खेड्यातली मुलगी भारताच्या एका टोकापासून प्रवास करून दूस-या टोकाला जात होती. पुढेही निरनिराळे प्रदेश हिंडावे लागणार होते. राष्ट्रगीतातल्या वर्णनाप्रमाणे पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारताचा पट्टा, ओडिसा, बंगाल, आसाम, असे सर्व प्रदेश तिला पहायला मिळतील या कल्पनेने ती सुखावली होती.
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रविवार, 20 अप्रैल 2014

मना अजाणा -- पूर्ण डीटीपी

 मना अजाणा....
                                                                                      ..... लीना मेहेंदळे(भा.प्र.से)      

आज तू या रोपाच्या समोर कुंडीच्या काठावर डोक टेकून बलला आहेत. आठवतय् ते आधी कुठे होत? खूप दूर कुठेतरी. खर तर ते रोप पण नव्हत-निव्वळ एक बीज. छे, ते ही नाही! फक्त एक अनुभूति। एक अनामिक अस्तित्व बोध- आहे, कुठे तरी मग हळूच ते तुझ्यापर्यंत कस आल? अमूर्त होत ते मूर्त होवून। अनामिक होत ते नामधारी बनून? का तू त्याला साद घातलीस? कांत्याला गोंजारलेस?                   कां त्याला कवेत घेऊन त्याच्या सांवळ्या, कोमल पानांवर आपले ओठ ठेकलेस?

    कुठुन तरी तू कुंडी आणलीस, कुठुन तरी माती आणि कुठुन तरी पाणीआणि रोपाला अलगद रूजायला एक जागा मिळवून दिलीस. राहील इथेच, आपल्या बालकनीत- तू मनोरमाला म्हटलेस. आणि त्याला रोज रोज पाणी कोण घालणार? मला नाही जमायच
ते.मनोरमा म्हणाली, काळजी नको करूस. मी टाकत जाइन.

   मधे खूप दिवस गेले. विदेशातून आपल्यापासून तू आपल्या नोकरीत
बूडून गेला होतास. रोज उशीरा उठायच. धावत पळतऑफिस गाठायच. परत येताना कधी मुलांना आणायच तर कधी भाजी बाजार करायचा. कधी स्कूटर सर्व्हिसिंग, कधी शेअर्सच्या मागे धावाधाव. खूपदा मित्रांबरोबर बियर पिणं. रोज उशीरा झोपण- सकाळी थकवा घेऊनच जाग होणं.

    एक दिवस तू अचानक बाल्कनीत आलास. रोपाला पाहिलस आणि हळूवारपणेगोंजारलस. व्वा अजून टिकून राहिलय की हे रोप. आपण कुठे रोज रोज पाणी देत होतो? माफ कर यार! तू बादली उचललीस आणि कुंडीवर उपडी केलीस- अर्ध पाणी जमिनीवरच !
    नाश्ता करतानाच मनोरमाने बजावल- आज लवकर घरी यायच हं! लखनौच्या आतेकडे लगनाच्या रिसेप्शनला जायचआहे.

   हो, हो! आणि त्या तिवारींच्या मुलाच्या वाढदिवसाला कधी जायच आहे?
ते परवा जायचय्. कांय, तिवारींच्या घरी जायचीइतकी उताविळी कां?”
अग, माझा जूना दोस्त आहे. शाळेपासून एकत्र वाढलोय् आम्ही. नोकरी पण एकदमच सुरु केली आम्ही या खात्यात.

2

खरं का नाही सांगत? त्याची बायको खूप सुंदर आहेआणि तू तिला फिदा आहेस.
काही तरीच कांय डोक्यात घेऊन बसलीस मनोरमा? बिचा-या तिवारीने कधी ऐकल तर कांय त्रास होईल त्याला?
    तू उठलास आणि बाल्कनीत आलास. बरेच दिवसांनी आला होतास.  रोप आपल्या रूबाबात हवेवर डुलत होता. तू त्याला म्हणालास- आज वेळ नाही. ऑफिसात लवकर पोचायच आहे. रोप उत्तरल-
ठीक आहे, इतके दिवस इकडे फिरकलानाहीस. मीकुठे काय म्हटल
? पण तू ऐकलंनाहीस बहुधा. तू परत जायला निघाला होतास.

  अजब आहे तुझे ऑफिस पण! सगळीच सरकारी ऑफिस अशी असतात कां? काम करणा-यांच्या डोक्यावर चौपट काम आणि न करणा-याला आरामाच बक्षीस. पण तू आपल्या कामांतआनंदी असतोस. दुसरे काम करोत ना करोत, तू करणार. ऑफिसात उशीरापर्यंत बसाव लागलतर बसणार. ब्रिजेश आणि फ्लाय ओव्हरची ड्रॉइंग्स तयार करून घेणार, टेंडर पेपर्स करणार, त्यांची लीगल डॉक्यूमेंटस् तपासणार, ऑडर्सकाढणार, मशीनरीचा अभ्यास, कन्सल्टंट बरोबर चर्चा, साइट इनस्पेक्शन! सगळी कामं एकाच साच्यातली- एकाच रुटीनची. पण तुला त्यांत दर वेळी नवीन कांयदिसत की ज्यामुळे तू नव्याने लागलेल्या ज्यूनियर इंजिनियरच्या उत्साहाने प्रत्येक ड्राईंग आणि प्रत्येक टेंडर डॉक्यूमेंटस्वतः वाचून काढतोस- त्याशिवाय तुला चैन नाही पडत. टेक्निकल पुस्तकं मागवून वाचत असतोस. जगात कुठ कांय नवीन टेक्निकल वापरल जातय् त्याची इथंभूत माहीती तुला असते. मग बॉस तुला थांबवून घेतात- हे सांग तर जरा! बॉस स्वतः का नाही वाचत?

   नको वाचू देत. मला वाचायलां आवडत, म्हणून मी वाचतो. म्हणूनच  साइट इनस्पेक्शन पण करतो कांयवाचलहोत आणि ते जमिनीवर कस उतरलय्?

   मग तुला प्रमोशन का मिळत नाहिये?

   बॉस पण स्वतःच्या चमच्यांना कुठुन शोधून पुढे आणतो. आणि त्यांनाच प्रमोशन देतो. मला आधीच देऊ शकले असते. माझ्या कांही कलिग्सना पण देऊ शकले असते. नाही दिलहे खरं! आमचा मंत्री पण तसाच आहे. म्हणून तर म्हणतों- सरकारांत काम करणा-याच्या वाट्याला फक्त काम असत, बक्षीस मात्र इतरांना असत.
 
तरी तू काम का करतोस?
माझा स्वभाव आहे .काम करू नको कां?
3

ते तूला जमणार नाही. तशी बेइमानी स्वभावात नाही.

मग माझ्या कामाबद्दल इतकी उलट तपासणी कां?

कांही नाही. असच. विषय निघाला म्हणून. जा, तू तुझ्या कामाला लाग.

आज एक अमेरिकन एक्सपर्ट त्याच प्रेझेंटेशन द्यायला येणार आहे. म्हणजे आजही ऑफिसात उशीर होणार. घरी पोचेन तेंव्हा दमून गेलो असेन.


आणि तुझ्या त्या रोपाचे कांय झाल ज्याच्याबद्दल एवढं सांगत असतोस?

खरच, त्याच्याकडे किती दिवस लक्षच द्यायला मिळाल नाही. कुठली जातकुळी आहे. कुणास ठाऊक, पाणीदिल नाही तरी इतके दिवस तजेलदार असत. बहुधा पाण्याशिवाय इतर कशावर तरी जगत असाव. चांगल मिळून गेलं.

मनोरमाने नोकरी सोडण्याचा निर्णय घेतला. तू समजावयाचा प्रयत्न केलास - हे बघ, तुझ्या नोकरीची आपल्याला कधीच गरज नव्हती.पण आता पंकज आणि नंदिनी दोघ होस्टेलवर आहेत. राहिला एकदा गुड्डु. नोकरी चालू ठेवलीस तर तुझ्या मनाला विरंगुळा राहील. पण मनोरमा हट्टी आहे. स्वतःच्या विचारापुढे कुणाच कांही ऐकत नाही.

तू सिगारेटच पॅकेट उचलून बाल्कनीत आलास. यांत्रिकपणे. रोपाजवळ येवून उभा राहिलास आणि सिगरेट पेटवलीस. विमनस्कपणे रोपाला गोंजारलस. याला कितीतरी दिवसांत नवीनपानं फुटलेली नाहीत. त्याने हळूच म्हटल- सिगरेटने रोपांना त्रास होतो.

अच्छा” , तू मूडमध्ये येवून म्हटलस- तू दोन नवी पानं उगवशील त्या दिवशी मी सीगरेट सोडून देईन.”

तू स्वतः खातिर पण सोडू शकतोस”- रोपाने मोठेपणाचा आवआणत सुनावल.

“तर मग तू पण स्वतः खातर दोनपानं उगवू शकशील. रोपाने हार मानली, आणि तुझ्या स्पर्शाच्या आनंदाने डुलतराहिल.

पुढल्या वेळी पाणी घालताना तुला दिसत- रोपाला दोन नवीन तजेलदार पान फुटली होती.

मनोरमाने विचारले-तू सिगरेट का सोडलीस? यू लूक्ड व्हेरी स्मार्ट व्हाइल स्मोकिंग।
4

आय डोन्ट वॉन्ट गुड्डु टू पिक अप धिस हॅबिट!”

ओके, आता तुझी सूटकेस पटकन पॅक करुन घे. उद्या सकाळीच आपल्याला सिमल्यात जायलानिघायच आहे. तू आजही उशीराच येणार आणि मी भरलेली सूटकेस तूला पसंत पडत नाही.”   

“…………..”                                                                                                                                                                                                                                                                                                   

“आणि आज मी स्वयंपकाला सुट्टी देणार आहे. तू डॉमिनोमधून काही तरी घेऊन ये.

आपण तिथेच जाऊ. मी  ऑफिस  मधून लवकर निघायचा प्रयत्न करेन. किंवा अस कर, मी गाडी पाठवून देतो. तू आणि गुड्डु तिथे पोहचा. मी ऑफिस मधून डायरेक्ट तिकडेच येतो. बरोबर आठ वाजता. मिश्राकडून लिफ्ट घेतो आजचा दिवस.

कांय हल्ली मिश्राची बायको कांही गूफ्तगू चाललय् वाटत?”

मनोरमा, प्लीज!”

आणि सिगरेट पण तू गुड्डु साठी सोडलेली नाहीस. काहीतरी वेगळच कारण आहे.

आहे. स्वतःच्या हेल्थचा विचार करून सोडलीआहे.

हेल्थचा एवढा विचार असेल तर स्वतःच्या अॅम्बिशन्स कमी कर. ऑफिसमध्ये नको वेळ घालवूस इतका.

ते पण करीन. आता मला पटकन दोन स्लाइस टोस्ट करून मिळतील कां?

मनोरमा बरोबर वाद टाळायचा असेल तर तिला खाण्यापिण्याच्या कांही तरी कामांत गुंतवून ठेवाव हा चांगला उपाय आहे.

मी ऊडून जाऊ कां? एका दिवशी रोपाने तुला विचारल. तुला हसूआल- वेड्या, रोपं कधीउडतात कां?”

“पण मला जायचय.

तू चमकून रोपाकडे पाहिलस. “कां?” खूप वेळ उत्तर नाही आल तस तू म्हणालास - रोपाची मुळं जमीनीतच राहीली पाहिजेत. नाहीतर रोप जागेल कस?” तरी पण रोप चुपच्च . तू मनाशी ठरवलस.

5
आतापासून याला सकाळ- संध्याकाळ पाणी द्यायच. पण तो निश्चय फक्त संध्याकाळ पर्यंतच टिकला. रोप तरी तू घातलेल्या पाण्यावर कुठे जगत होत?

अचानक तुझ्या ऑफिसच रूटीन बदलल. आता नॅशनल हायवेज वर जिथे जिथे रेल्वे ओव्हरब्रिज किंवा फ्लाय ओव्हर करायचे होते त्यांचा मास्टर प्लान करायची जबाबदारी तुझ्यावर टाकली. आता ऑफिसमध्ये रात्रीचे आठ-नऊ ही नित्याचीच बाब झाली. खूप वर्षानंतर तुला खरच चान्स मिळाला होता- आपली प्रोफेशनल योग्यता दाखविण्याचा . तू आपल्या कलिग्सना बोललास- पुढे जेव्हा या रस्त्यांवरून प्रवास करीन तेंव्हा हेच सर्व स्पॉटस् माझी ओळख ठरतील. आयुष्य आता जास्त ठळकपणे कम्पार्टमेंटस् मध्ये विभागल गेल. अॅम्बिशन नंबर एक- ऑफिसची नवी जबाबदारी पूर्ण करायची. अॅम्बिशन नंबर दोन- मनोरमाला बरोबर घेऊन मित्र आणि नातेवाईकांबरोबर पार्ट्या रंगवायच्या.


मनोरमा मूडी आहे. विशेषतः तिथे सर्वांसमोर तुझ्यावर हक्क गाजवण. पण अचानक एखादी बाई तिच्या डोक्यात शिरते. मग ती कल्पना करत बसते की, तुझे आणि त्या बाईचे काही संबंध आहेत. मग घरी येऊन तुझ्याशी भांडण आणि स्वतः डिप्रेस होण. प्रत्येक वेळा एका नव्या उत्सहाने तू मनोरमाला बरोबर घेऊन पार्टीला जातोस. कधी कधी ती ठीक असते. पण कित्येकदा परत येते ती डिप्रेशन घेऊनच. हल्ली हे प्रमाण बरच वाढलय. मग तिला कुठेतरी बाहेर नेऊन आणाव लागत. हल्ली ती टूर्सवर बरोबर येण्याचा हट्ट धरते. चला, ऑफिसच काम वाढलते एका अर्थी बरच झाल- मनोरमाला बाहेर नेण जमून जातय्.

तिघं मुलं चांगलेरिझल्टस्घेवून
एक एक करून पाखरांच्या पिलांप्रमाने भुर्र उडून गेलीत. नंदिनी लग्न करुन आणि पंकज बी.ई.ची डीग्री घेऊन अमेरिकेला गेलेत. गुड्डु पण चैनईला कोर्स करतोय. तू नवीन गाडी कधीच घेतली आहेस. एक प्रमोशन मिळालय् आणि दुसरं मिळण्याच्या मार्गावर आहे. बस कांही प्रोसीजरल गोष्टी राहिल्यात. आता तू ऑफिसात जास्तच बुडालेला आहेस. ऑफिस, मित्र-नातेवाईक आणि मनोरमा. आयुष्य एकसंध, संथ आणि सार्थक वाटतअसतांनाच, रोपासमोर आल की कांही तरी वेगळं घडत. अस वाटत की, जीवनाचा कांही तरी वेगळा अर्थ आहे जो हाताला लागत नाहीये. तो एक वेगळा रस्ता आहे- जणू अजून धुक्यांत, काळोखांत दडलेला. तो दिसावा म्हणून तू कासावीस होतोस-
पण तात्पुरताच. मग पुन्हा आपल रुटीन.

रोपाने तुला एक दिवस एक गोष्ट ऐकवली- एक निळा पक्षी होता। तो ऊडून चंद्रावर जायच म्हणायचा. सगळे त्याला हसायचे. रोज रात्री जेंव्हा इतर पक्षी झोपले असत तेंव्हा तो उठायचा आणि चंद्राच्या दिशेने उड्डाण करायचा. चंद्राभोवती गोल घिरट्या घालायचा. मग आपले पंख घट्ट मिटून बाणासारखाउंच उंच जायचा. मग अगदी दमून गेल्यावर तसाच खाली यायचा. पुन्हा घिरट्या घालत स्वतःला सावरायचा. कधी कधी उंचावर पोचून सुध्दा त्याच्या पंखात बळ उरलेल असायच. मग तो तिथल्या उंचीवर पंख उघडून घिरट्या घालायचा आणि पुन्हा वरच्या दिशेने झोपावायचा.

6
  रोपाला माझ्याकडून कांय हवं आहे?


चुकीचा प्रश्न विचारतो आहेस. खरा प्रश्न आहे की, तुला रोपाकडून कांय हंवआहे?

मला कांय हवे असणार? मला कांही नको आहे?

मग त्याला उडून जायला कां नाही म्हणतोस?

ते मरुन जाईल.

जाईना कां? प्रत्येकाला एक दिवस मरायचच असत. त्याच्या मरणाचेतुला कांय?

अरे वा। कुणाला उगीच मरू द्यायच ?  त्याच दुःख नाही का होणार?

होईल काही दिवस. आता तुझे काकाच घे. त्यांनी तुला लहानपणापासून सांभाळल, वाढवल. वडीलांचीकमतरताभासू दिली नाही. तुझ पण किती प्रेम होतत्यांच्यावर. ते गेले, तुला दुःख झाल. पण आज कांय आहे? तुला त्यांची कमी भासली, व्याकुळलासअस झालय् का?
“…………..”

पुन्हा रोपाने विचारलतर सांग उडून जा म्हणून.

अरे पण, ते उडू कस शकेल?

ते पण त्यालाच विचार ना!

दॅटस् अ पॉईंट!

आजकाल मनोरमाची तब्येत जास्तच खराब असते. तिचा संशयी स्वभाव आणि डिप्रेशन दोन्ही वाढले आहेत. का ती माझ्याबद्दल असा संशय घेतेकळत नाही.

या संशयी स्वभावाला कधीपासून सुरूवात झाली?

अगदी पहिल्यापासून. लग्नाच्या पहिल्या रात्रीच ती मला म्हणाली- तू इतका हॅन्डसम आणि स्मार्ट आहेस, तुझ्यावर कॉलेजच्या मुली फिदा नव्हत्या अस असूच शकत नाही.

मग तू कांय म्हणालास?
7


मी त्याला पाहिल आहे.रोप सांगत राहिल. तो पक्षी एक दिवस नक्कीच चंद्रावर पोचेल.
ओ हो। म्हणूनच तुझ्या मनांत पण उडायचा विचार आलाकां?

नाही. त्याला कारण वेगळं आहे.

एक दिवस रोपाने तुला एका फुलपाखराची गोष्ट सांगितली. राजा- राण्यांसारखा त्याचा दिलदार स्वभाव होता. त्याला आपल्या पंखाचा आणि आपल्या नृत्याचा अभिमान होता. त्याला हुकूमत करता येत होती आणि कुणालाहीकांहीहीदेऊन टाकायची तयारी पण होती. खूपशा फुलांवर त्याने पायांनी एक अदृश्यअशी जाळी विणली होती. रात्री फुलपाखरु त्या जाळीवर नृत्य करायचं. नाचता नाचता त्याचे पंख गळून पडत आणि मग नवे पंख फुटत- वेगळ्या रंगाचे, वेगळ्या नक्षीचे.

फुलपाखराकडे असे शंभर जोडी पंख आहेत. ज्या रात्री नृत्याची गती खूप वाढेल आणि नव्व्याण्णव जोड्या पंख गळून पडतील आणि शंभरावी जोडी उगवेलत्या दिवशी हे फुलपाखरु सहळ्यांना सोनेरी क्षण वाटू शकेल. तू पण त्याच्याकडून सोनेरी क्षण मागून घेऊशकशील.

या गोष्टीवर हसता हसता तुझी पुरेवाट झाली. काय वेड्यासारख्या गोष्टी गाढतोस!” तू रोपाला म्हटलस. रोप जरा वेळ स्तब्ध झाल. मग हळूच विचारल- मी उडून जाऊ?”

तुझ उत्तर ऐकण्यासाठी रोपाने जीव एकवटला होता. नको, तू मरून जाशील!” तू अचानक वाकून रोपाचा मुका घेतलास.

“आठवतय् खूप आधी पण तू असाच मुका घेतला होतास.- रोपाचा आनंद त्याच्या पानापानांतून ओसंडत होता.

मी अस अजून करू शकतो. पण..
­­­­
पण कांय?

तू मोठ्याने हसलास- कुणी बघतील तर म्हणतील वेडा आहे.

रोप एकदम आक्रसून गेल. तू त्याला बोलतं करायचा प्रयत्न केलास. पण ते गप्पच राहिल.
8

मी हसलो होतो. हे बघ,कुणी म्हटल- तू हॅन्डसम आणि स्मार्ट आहेस तर पुरुष पहिल्यांदा त्याच तुकड्याचा विचार करतो. तिच्या वाक्यातला दुसरा भाग खरा नव्हता पण तेंव्हामी तिकडे लक्ष दिलनाही- आणि प्रतिवादही केला नाही. तस पाहिल तर मनोरमा पण खूप सुंदर होती. माझ्याहून कितीतरी सुंदर! मी तरी पहिल्याच दिवसापासून तिच्या प्रेमात पडलो.

आणि ती पण पहिल्याच दिवशी तुझ्या प्रेमात पडली?

ते मला नाही माहित.

अस कां म्हणतोस? ती तुझ्या मुलांची आई आहे, तुझं घर एवढ्या आसुशीने सांभाळतो. पार्टीत मी पाहिल आहे. तुझ्यावर किती हक्क आणि अभिमान गाजवते.

यालाच प्रेम म्हणतात कां?

मग प्रेम कशाला म्हणतात?  तू जेंव्हा सांगतोस की, तू पहिल्याच दिवशी तिच्या प्रेमात पडलास तेंव्हा तुला नेमके कांय म्हणायचे असते? व्हॉट इज युअर डेफिनेशन ऑफ लव्ह?

एवढं सगळ नाही मला कळत. मी माझसगळच तिला द्यायला तयार होतो.दिल सुध्दा. पण तिच्या मनात काही तरी रिझर्वेशन होत, अजूनी आहे- म्हणून तर माझ्यावर संशय घेते.

तिला डॉक्टर कडे ने.

ती नाही म्हणते. मी कितीदा तरी सुचवल आहे. अॅण्टी डिप्रेशन टॅब्लेटस् पण आपल्या मनानेच घते.

त्या गोळ्या घेण चांगल नाही. जास्त घेतल्याने रिस्क पण आहे.

ते पण तिला माहित आहे.

तिला डॉक्टरकडे नेण गरजेच आहे. दॅट शुड बी युअर फर्स्ट प्रायोरिटी.
पण कस घेऊन जाऊ?

तुझ्या प्रेमाची शपथ देऊन. यू नो, तुझ्यात एक कमी आहे- जेंव्हा जे सांगायला, बोलायला पाहिजेतेंव्हा तू सांगत नाहीस.

मी शीकायला सुरुवात करतो. थँक्स फॉर दि टिप!

आणि त्या रोपाला उडून जायला सांगितलस?

9
नाही! आय थिंक आय अॅम इन ल्वह विथ इट.

व्हॉट आर यू टॉकिंग!

येस. त्याने जाव अस मला नाही वाटत.

रोपाने तुला एका शिंपल्याची गोष्ट सांगितली. शिंपल्यातल्या किड्याला माहित असत की, त्याच्या आजूबाजूचा समुद्र, त्याची रेती, तिथले कडक, पाण्याच्या आतलं शेवाळ आणि झाडपालीवगैरे कसे आहेत. आपल्या शिंपल्याची नकाशी आणि रंगसंगती पण तो त्याच पध्दतीने तयार करतो. त्यामुळे शिंपला आपल्या परिवेशात बेमालूम मिसळून रहातो. उठून दिसत नाही. त्यामुळे मग त्याच संकट कमी होत.

पण एक शिंपली अशी होती. ती म्हणाली, मी खूप लांब लांब फिरायला जाणार. जग बघायलाजाणार. ती निघाली. वाटेत वेगवेगळे परिसर होते. त्याप्रमाणे तिला रंग बदलावे लागते होते. रस्ते अनोळखी. चालून चालून आणि रंग बदलून शिंपली दमून गेली. मग ती एका चित्रकाराकडे गेली. तो समजूतदार होता. शिंपलीला कांय हवय आणि आपण कांय देऊ शकतो हे त्याला कळत होत. त्याने शिंपलीवर ब्रश फिरवून तिला खूप मोठ्ठ केल आणि आकाशाच्या दिशेने भिरकावून दिल. ती ढगांत जाऊन पोचली. तू पावसाळ्यांत आणि शरद ऋतूत ढग बघितले आहेस कां? तिथे तुला मोठ शिंपलीचा आकार दिसतो. तीच ती साहसी शिंपली.

तूं मला या ज्या गोष्टी सांगतोस, कधी पक्ष्याची, कधी फुलपाखराची, कधी शिंपलीची, यांचा अर्थ कांय
आहे?

कां? तुला आवडत नाहीत माझ्या गोष्टी?

खूप आवडतात. तुला माहित आहे, मी जेंव्हा तुझ्या गोष्टीतल्या पक्षी, फुलपाखरु अशा पात्रांचा विचार करतो, तेंव्हा मनाला एक वेगळाच उत्साह वाटतो-- शीण निघून जातो.

पण त्यांच विचार कधी करतोस ?

काम करताना खूप वेळा अचानक तुझ्या गोष्टी आठवतात. माझ्या जगात तर फक्त ऑफिस, घर, मनोरमा, मुलं, मित्र, पार्ट्याएवढेच आहे. तुझ जग मात्र खूप खोलवर आणि खूप वेगळ आहे- उल्हासाच जग आहे तुझ!

माझ्या गोष्टी तुला आवडतात याचा मला खूप आनंद होतोय.

10
आणिमला पण!

दुस-या दिवशी रोपावर दोन नवी पान फुटली होती. तू मनाशी खूनगाठ बांधलीस की, ज्या दिवशी रोप तुला
गोष्ट सांगत, बहुधा त्या दिवशी त्याला नवी पान फुटत असावीत. आता पुढच्या गोष्टीच्या दिवशी आठवणीने तपासायला हव. अगदी वॉचठेऊन.

डिपार्टमेंट मध्ये धूळ खात पडलेली एक फाईल कशी कुणास ठाऊक बाहेर निघाली आणि पटकन तुला एक प्रमोशन मिळून गेले. आता कामाचा बोजा अजून खूप वाढला. मनोरमाला तू कित्येकदा सुचवलस की काही दिवस नंदिनीकडे अमेरिकेला राहून ये. पण ती तयार नव्हती. मी तुला सोडून जाणार नाही अस म्हणायची. ऐकून खूप बरं वाटायच.

एकदा म्हणाली- मुलांच जग आता वेगळ झालय. आपण त्यांच्याप्रमाणे अॅडजस्ट होऊ शकणार नाही. पण एकदा अचानक खूप चिडली म्हणाली- तुझे कुणाबरोबर अफेयर्सचालू आहेत का? म्हणून मला जायला सांगतोस कां? त्यानंतर तू तिला सांगण सोडून दिलस! अफेयर्स?  हो. या रोपाबरोबर चालू आहेत. पण ते मनोरमाला का सांगायच?
शेवटी एकदा तू रोपाला विचारलय- “मला तर कळत नाही, पण तू सांग, तू उडणार कसा?”

आधी मला पान गाळून टाकावी लागतील. मग फांद्या, मग मुळं! मग मी बुंध्यातून निघून उडून जाईन, आणि खूप उंच जावून पोचेन.

तिथे काय करशील?”

तिथून सगळ्यांना बघेन . लांबून प्रत्येक गोष्ट वेगळी दिसते. प्रत्येकाच्या आजूबाजूला त्यांचे स्वतःच्या रंगांचे ढग असतात. तुझे ढग कसे आहेत ते पण बघेन.

आणि तमझ्या स्वतःच्या ढगांचं काय?”

त्यांना मी कस बघणार ? स्वतःचे ढग कुणीच पाहू शकत नाही.

पण इथे थांबलास तर पाहू शकतोस. आपली पानं, आपली मुळं.. .. .. मला।शेवटच्या शब्दाला तुझा श्र्वास अडकळल्यासारखं का वाटल?

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बरोबर आहे तू म्हणतोस ते.

तू इथे आनंदात नाहीस कां?”

या एका प्रश्नाच उत्तर रोप देतच नाही. त्याला इथे आणण्यांत कांही चूक होती कां?

आज सकाळीसकाळी ऑफिसातनोटिस फिरवली- कुठल्याश्या सिक्युरिटी एक्सरसाइझच्याकारणाकरता सगळीऑफिसेसचार वाजता बंद होणार होती. कितीतरी महत्वाच्या फाइलीहातोवेगळ्या करायच्या होत्या. तू जे कांहीफाइलसमध्ये आणि स्टाफला सूचना देण्यामध्ये अडकलास ते चार कधी वाजले तेच कळले नाही. आज लंच खायची फुरसत सुध्दा मिळाली नाही. उठाव लागत नसत तर कितीतरी फायली काढायच्या होत्या. कांही डिझाइन्सफायनल करायची होती. रात्री दहाच्या आधी कुठला निघणार होतास! पण आज निघावच लागल.

घरी येता येता आठवल की, आज तर नौटियालच्या मुलाच्या पार्टीसाठी जायचय्. खास खास दोस्तांना त्याने साडे सहा वाजताच यायला सांगितलय्. त्याचा मुलगा अमेरिकेत पी. एचडी. करुन आला आहे. आणि दोन तीन महिन्यांनी परत जाणार आहे.

का कुणास ठाऊक- आज पहिल्यांदाच अस वाटल की, पार्टीला जाऊ नये. घरी थांबून रोपा बरोबर कांही वेळ घालवावा. आज आपणच त्याला गोष्ट ऐकवायची. बघू या तरी जमते का ते! कशी घडते गोष्ट!

पण पार्टीला तर जावच लागेल. दहा दिवसांपूर्वीच नंदिनी आणि गुड्डु पण आलेली आहेत आणि नौटियालने बजावलय की, त्यांना पण घेऊन ये. शिवाय वाटेत मनोरमा साठी निळ्याशेडची आय- लॅशेस पण विकत घ्यायची आहे- हे नवीन काम पण आयुष्यांत पहिल्यांदाच. तरी बर तिच्या ब्यूटी पार्लरवालातुला ओळखता आणि मनोरमाने त्याला शेड सांगून ठेवली आहे. तू फक्त पिक करायची आहेस. सकाळीच ड्रायव्हरला त्याच्याकडे पाठवून द्यायला हव होत. चुकलच.

घरी येऊन चहा घेता घेता अचानक बाल्कनीकडे नजर गेली तर सगळीकडे माती पसरलेली. बाहेर येऊन पाहिलं- कुंडी फुटली होती, माती सगळीकडे विखूरली होती आणि रोप जमीनीवर आडव पडल होत.

काय झाल मनोरमा?

आज मी पाय घसरून जोरात पडले बाल्कनीत. पहा ना अंगठा किती दुखरा झाला आहे कुंडीवर आपटल्याने. पण आता तू पटकन शॉवर घवून तयार हो. उशीर झालेला मला नाही आवडणार . मिसेज प्रभाकरने मगाशीच फोन करुन सांगितले की, ती पण लवकर येणार आहे.

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कमाल आहे. मनोरमा आज पहिल्यांदा रोपाबद्दल - नाही, नाही कुंडीबद्दल कांहीतरी बोलली. इतकी वर्ष कांहीच बोलली नाही- चांगल नाही की वाईट - जणू रोपाच अस्तित्व नव्हतच कधी.

इतका दम का लागलाय् तुला?

आताच पार्कमध्ये वॉक करुन परत येतोय्.

मनोरमा आणि मुल कुठे आहेत.

शेजारी दंठियाच्या मुलीच्या लग्नासाठी कपडे आणि दागिनेमागवलेत. ते पसंत करायला मनोरमा आणि नंदिनीला ओढून घेऊन गेलेत. नाही तर त्या कुठल्या इतक्या लवकर उठायला. आणि गुड्डू झोपला असणार अजून.

मग तर रोपाबद्दल आरामशीर गप्पा होऊ शकतात.

ओः, त्याची ट्रॅजेडी झाली. मनोरमाच्या हातून कुंडी फुटली. बोलता बोलता तू दार उघडून बाल्कनीतआलास.

अरे, कधीपासून फुटल्येय् कुंडी? तू काही करत का नाहीस?

तीन दिवस झालेत. मी कांय करु शकतो. आतापर्यंत वेळच मिळाला नाही नवीन कुंडी आणायला.
अरे, पण अक्कल चालवलीस तर दुसर काही तरी करता येईल.

तू गादीवरची चादर ओढून आणलीस आणि झक्कन डोक्यांत उजेड पडला की कांय कारायला हवय. चादरीत रोपाची मुळ आणि माती घट्ट बांधून त्यांना कुंडीसारख उभ रचून ठेवलस आणि पाणी शिंपडलस . आता रोप या अवस्थेत अजून कांही दिवस जगू शकेल. तोपर्यंत नवीन कुंडी येईल.

खरच कमाल आहे हंतुझ्या रोपाची. बघ इतके दिवस तू असच टाकलय तरी कस फ्रेश राहिलय्.

हो ना! कदाचित वाट बघत असेल की मी कांय करुन शकतो.  तू हे म्हणालास आणि स्वतःच्याच शब्दांनी दचकलास ते शब्द डोक्यांत असे घुमत राहिले की ऑफिसला जातांना तू ड्रायव्हरला गाडी वळवून घ्यायला सांगितलीस. आज आधी कुंडीची खरेदी, मगच इतर कांही.

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सायंकाळी रोपाला पुनःपहिल्यासारखच नटवून सजवून कुंडीत स्थानापन्न केलस. पण सारख वाटत राहिल की त्याची नजर तुझा पिच्छा करत्येय्. तुला कांही प्रश्न विचारत्येय्.

उडण्याबद्दल कां?”

उडण्याबद्दल कां?

रात्रभर वारंवार तुझी झोपमोड  होत होती. तू सारखा उठत होतास. कधी बाथरूमला जाण्यासाठी तर कधी पाणी पिण्यासाठी. प्रत्येक वेळी हाच प्रश्न तुझ्या डोक्यात घोंघावत होता. कशीबशी रात्र संपली आणि तू धावत बाल्कनीत आलास.

होय, जे कालपर्यंत हिरवगार होत, उनमुक्त हसत होत, त्या रोपाने एका रात्रीतचत्याने आपली निम्मी पान गाळून टाकली होती. ओ गॉड!

तू हॉल आणि बाल्कनीच्या मधल दार लावून घेतलस. आज रोपाशी बोलतांना मधेच कुणी आल्याची रिस्क घ्यायची नाहीये. शेजारपाजारच्या खिडकी अगर बाल्कनीतून कुणी बघत असेल तर बघेल, वेडा म्हटले तर म्हणेल, आज त्यांची पर्वा करायची नाहीये.

पर्वा आहे फक्त रोपाची. तू जाऊ शकत नाहीस माझ्या दोस्ता! मला एकट सोडून जाऊ शकत नाहीस

सगळीम्हणतात- मी जी गोष्ट जेंव्हा बोलायला पाहिजे तेंव्हा बोलत नाही. कदाचित मला सुचतच नाही. पण आज वोलेनकारण आज मला सगळ स्वच्छ दिसतय्.

तू मी लावलेल्या कुंडीत पाण्याशिवायही जगत होतास- ते कस आणि कुणाच्या बळावर, हे आज मला कळतय्.

रोपाला माझ्याकडूनकांय हवय्?” असंमी ज्याला त्याला विचारीत असे. कधी तुलाही विचारीत असे. पण आज मला ते उत्तर समजून आलय्.

मी म्हणत असे- मला रोपाकडून कांय हव असणार?” पण आज मला कळतय्- मला तुझी साथ हवी होती- हवी आहे.

मी तुझी काळजी घेतली नाही. किती किती दिवस तुला पाणी द्यायला, बघायलाआलो नाही, तुला गोंजारल नाही. आणि मी त्याच जस्टीफिकेशन देत असे- कांय करु, मला वेळच मिळत नाही. पण आज मला कळतय् की वेळ आहे. वेळेला असावच लागेल. आता मी वेळेच्या अधीन नाही.

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आज मी वेळेला ओळखलय्. खूप फ्लेक्सीबल असते वेळ. जितका वेळ मी तुझ्याबरोबर घालवीन, तेवढा वेळ माझ्यासाठी नव्याने निर्माण होईल. वेळेला माझी भरपाई करावीच लागले. ते आश्र्वासन माझ्या कानावर येतय्. तो वायदा मला वेळेच्या चेह-यावर वाचता येतोय्.

तसाच वायदा तुझ्या चेह-यावर पण दिसू दे, माझ्या दोस्ता ! माझ्या मना! बघ, मी तुला प्रेमाने स्पर्श करतोय्. तसाच तुझा प्रेमाचा
स्पर्श मला पण दे. मला माहित आहे की ते प्रेम तुझ्या अंतर्गात आहे. आज त्याला आतल्या आत लपवू नकोस. त्याला बाहेर येऊ दे. उचल तुझे हात आणि माझ्या गालांवर, कपाळावर ठेव.

माझ्या मधे जे काही आहे ते तूच आहेस. तू माझ्या प्रेमावर जगत होतास आणि त्या बदल्यांत मला शंभर पटींनी खुलवत होतास.

ते तुझ प्रेम मी एवढे दिवस ओळखल नाही. पण आज बघतोय्. जे नाही बोललो, ते आज बोलतोय्. जे केले नाही आजवर, ते आतापासून करणार आहे- तुझी काळजी घेण, आणि बदल्यात तुझी साथमिळवण!

डोण्ट से इट इज टू लेट! परत बोलाब आपल्या पानांना. परत उगव आपल्या फांद्यांना - यावेळी तुझ्या स्वतःखातर नाही- माझ्या खातर.

रोपाला कवेत घेऊन कुंडीवर डोक टेकून तू बसून राहिलास. रोपाच्या फांद्या थरथरल्या. त्यांनी हलकेच तुला स्पर्श केला. वेळ
थांबून राहिली.
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